अमेरिका-ईरान जंग में बिचौलिया बनकर चमकने की कोशिश कर रहा पाकिस्तान
अमेरिका-ईरान जंग में बिचौलिया बनकर चमकने की कोशिश कर रहा पाकिस्तान
दुनियाभर में आतंकवाद और कंगाली के लिए फजीहत झेलने वाला पाकिस्तान इस समय अमेरिका-ईरान युद्ध में 'बिचौलिया' बनकर अपनी अंतरराष्ट्रीय 'थू-थू' को चमकाने की ...और पढ़ें

शहबाज शरीफ, डोनाल्ड ट्रंप और आसिम मुनिर।
डिजिटिल डेस्क, नई दिल्ली। पिछले कई सालों से कंगाली, आतंकवाद और वैश्विक मंच पर 'थू-थू' झेलने वाला पाकिस्तान इस समय दुनिया के सामने अपनी छवि बदलने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। इस बात को ऐसे समझिए कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध में अचानक पाकिस्तान एक 'बिचौलिया' बनकर उभरा है।
इसके चलते स्विट्जरलैंड के बुर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में जब शांति वार्ता शुरू हुई, तो अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनिर की तारीफ की। वेंस ने शहबाज शरीफ को डोनाल्ड ट्रंप का दोस्त बताया और सेना प्रमुख आसिम मुनिर को एक राजनयिक भी कहा।हालांकि इसके बाद भी सवाल यह है कि क्या इस तात्कालिक तारीफ से पाकिस्तान पर लगा 'आतंकवाद के मददगार' होने का पुराना कलंक धुल जाएगा?
युद्ध के बीच अचानक कैसे चमकी पाकिस्तान की किस्मत?
बता दें कि पिछले करीब चार महीनों से चल रहे अमेरिका-ईरान संकट में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया। शहबाज शरीफ और आसिम मुनिर ने अमेरिकी और ईरानी वार्ताकारों के बीच गुप्त रास्तों (बैक चैनल्स) से संदेश पहुंचाने का काम किया।
'इस्लामाबाद समझौता' और एलान की रणनीति
'हम पहले की नीति पर चल रही दुनिया' में पाकिस्तान ने भी अपने वर्चस्व की नाकाम कोशिश की। जहां पिछले हफ्ते पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ ने ही सोशल मीडिया पर सबसे पहले एलान किया था कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम हो गया है, जिसे अब 'इस्लामाबाद समझौता' कहा जा रहा है। इस दस्तावेज पर डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ शहबाज शरीफ के भी दस्तखत हैं।
हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि जो पाकिस्तान 2025 की शुरुआत तक मध्य पूर्व (Middle East) में पूरी तरह अलग-थलग पड़ा था और अपनी हरकतों की वजह से फजीहत करा रहा था, वह आज अचानक इस क्षेत्र का मुख्य खिलाड़ी बनने का ढोंग कर रहा है।
भारत के डर और 'नोबेल पुरस्कार' की चापलूसी से मिला यह मुकाम
पाकिस्तान का यह नया रूप असल में उसकी पुरानी चापलूसी और मजबूरी का नतीजा है। करीब एक साल पहले भारत के साथ हुए चार दिनों के सैन्य टकराव के बाद जब डोनाल्ड ट्रंप ने खुद को शांतिदूत बताया, तो भारत ने साफ कह दिया था कि इसमें अमेरिका का कोई रोल नहीं था।
लेकिन, भारत के खौफ से कांप रहे पाकिस्तान ने ट्रंप की इस बात को लपक लिया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख मुनिर ने ट्रंप की इतनी चापलूसी की कि उन्हें 'नोबेल शांति पुरस्कार' देने तक की वकालत कर डाली। इसी चमचागिरी के इनाम के रूप में ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान को यह भाव देना शुरू किया है।
क्या कंगाली और बदनामी के दौर से बाहर निकल पाएगा पाकिस्तान?
इतने के बाद भी सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान अब भी कंगाली से बाहर निकल पाएगा? इस बात को ऐसे समझिए कि नापाक पड़ोसी पाकिस्तान को उम्मीद है कि इस मध्यस्थता के बदले उसे कई फायदे होंगे। जैसे कि अर्थव्यवस्था को ही मानिए। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह तबाह हो चुकी है। ट्रंप से नजदीकियों के कारण कुछ अमेरिकी कंपनियों ने पाकिस्तान में क्रिप्टोकरेंसी और खनिज क्षेत्रों में निवेश के वादे (MoUs) किए हैं, जो अरबों डॉलर के बताए जा रहे हैं।
दूसरी ओर पाकिस्तान को यह भी लगता है कि इस कदम से वह वाशिंगटन, बीजिंग और खाड़ी देशों के बीच अपनी रणनीतिक साख दोबारा बना लेगा और भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव के साए से बाहर आ सकेगा।
पुरानी फजीहत और जो बाइडेन का वो बयान
गौरतलब है कि भले ही आज ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान पर मेहरबान दिख रहा हो, लेकिन दुनिया भूली नहीं है कि इसी पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन छिपा हुआ था, जिसे 2011 में अमेरिकी सेना ने मार गिराया था। उसके बाद से ही अमेरिका के साथ पाकिस्तान के रिश्ते बेहद कड़वे रहे हैं।
इतना ही नहीं पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने तो पाकिस्तान को उसके परमाणु कार्यक्रम के कारण दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में से एक तक कह दिया था, जिससे पूरी दुनिया में पाकिस्तान की भारी किरकिरी हुई थी।
पाकिस्तान की चार दिन की चांदनी...
गौरतलब है कि डोनाल्ड ट्रंप का मिजाज बेहद अप्रत्याशित और पलटने वाला है। ऐसे में आज जो जेडी वेंस पाकिस्तान की तारीफों के पुल बांध रहे हैं, कल अमेरिकी हित बदलते ही वे पाकिस्तान को दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंक सकते हैं।
ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की यह 'राजनयिक चमक' महज चार दिन की चांदनी है; जब तक वह अपनी जमीन से आतंकवाद का खात्मा नहीं करता, अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी वास्तविक 'थू-थू' बंद नहीं होने वाली।
दुनियाभर में आतंकवाद और कंगाली के लिए फजीहत झेलने वाला पाकिस्तान इस समय अमेरिका-ईरान युद्ध में 'बिचौलिया' बनकर अपनी अंतरराष्ट्रीय 'थू-थू' को चमकाने की ...और पढ़ें

शहबाज शरीफ, डोनाल्ड ट्रंप और आसिम मुनिर।
डिजिटिल डेस्क, नई दिल्ली। पिछले कई सालों से कंगाली, आतंकवाद और वैश्विक मंच पर 'थू-थू' झेलने वाला पाकिस्तान इस समय दुनिया के सामने अपनी छवि बदलने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। इस बात को ऐसे समझिए कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध में अचानक पाकिस्तान एक 'बिचौलिया' बनकर उभरा है।
इसके चलते स्विट्जरलैंड के बुर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में जब शांति वार्ता शुरू हुई, तो अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनिर की तारीफ की। वेंस ने शहबाज शरीफ को डोनाल्ड ट्रंप का दोस्त बताया और सेना प्रमुख आसिम मुनिर को एक राजनयिक भी कहा।हालांकि इसके बाद भी सवाल यह है कि क्या इस तात्कालिक तारीफ से पाकिस्तान पर लगा 'आतंकवाद के मददगार' होने का पुराना कलंक धुल जाएगा?
युद्ध के बीच अचानक कैसे चमकी पाकिस्तान की किस्मत?
बता दें कि पिछले करीब चार महीनों से चल रहे अमेरिका-ईरान संकट में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया। शहबाज शरीफ और आसिम मुनिर ने अमेरिकी और ईरानी वार्ताकारों के बीच गुप्त रास्तों (बैक चैनल्स) से संदेश पहुंचाने का काम किया।
'इस्लामाबाद समझौता' और एलान की रणनीति
'हम पहले की नीति पर चल रही दुनिया' में पाकिस्तान ने भी अपने वर्चस्व की नाकाम कोशिश की। जहां पिछले हफ्ते पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ ने ही सोशल मीडिया पर सबसे पहले एलान किया था कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम हो गया है, जिसे अब 'इस्लामाबाद समझौता' कहा जा रहा है। इस दस्तावेज पर डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ शहबाज शरीफ के भी दस्तखत हैं।
हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि जो पाकिस्तान 2025 की शुरुआत तक मध्य पूर्व (Middle East) में पूरी तरह अलग-थलग पड़ा था और अपनी हरकतों की वजह से फजीहत करा रहा था, वह आज अचानक इस क्षेत्र का मुख्य खिलाड़ी बनने का ढोंग कर रहा है।
भारत के डर और 'नोबेल पुरस्कार' की चापलूसी से मिला यह मुकाम
पाकिस्तान का यह नया रूप असल में उसकी पुरानी चापलूसी और मजबूरी का नतीजा है। करीब एक साल पहले भारत के साथ हुए चार दिनों के सैन्य टकराव के बाद जब डोनाल्ड ट्रंप ने खुद को शांतिदूत बताया, तो भारत ने साफ कह दिया था कि इसमें अमेरिका का कोई रोल नहीं था।
लेकिन, भारत के खौफ से कांप रहे पाकिस्तान ने ट्रंप की इस बात को लपक लिया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख मुनिर ने ट्रंप की इतनी चापलूसी की कि उन्हें 'नोबेल शांति पुरस्कार' देने तक की वकालत कर डाली। इसी चमचागिरी के इनाम के रूप में ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान को यह भाव देना शुरू किया है।
क्या कंगाली और बदनामी के दौर से बाहर निकल पाएगा पाकिस्तान?
इतने के बाद भी सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान अब भी कंगाली से बाहर निकल पाएगा? इस बात को ऐसे समझिए कि नापाक पड़ोसी पाकिस्तान को उम्मीद है कि इस मध्यस्थता के बदले उसे कई फायदे होंगे। जैसे कि अर्थव्यवस्था को ही मानिए। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह तबाह हो चुकी है। ट्रंप से नजदीकियों के कारण कुछ अमेरिकी कंपनियों ने पाकिस्तान में क्रिप्टोकरेंसी और खनिज क्षेत्रों में निवेश के वादे (MoUs) किए हैं, जो अरबों डॉलर के बताए जा रहे हैं।
दूसरी ओर पाकिस्तान को यह भी लगता है कि इस कदम से वह वाशिंगटन, बीजिंग और खाड़ी देशों के बीच अपनी रणनीतिक साख दोबारा बना लेगा और भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव के साए से बाहर आ सकेगा।
पुरानी फजीहत और जो बाइडेन का वो बयान
गौरतलब है कि भले ही आज ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान पर मेहरबान दिख रहा हो, लेकिन दुनिया भूली नहीं है कि इसी पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन छिपा हुआ था, जिसे 2011 में अमेरिकी सेना ने मार गिराया था। उसके बाद से ही अमेरिका के साथ पाकिस्तान के रिश्ते बेहद कड़वे रहे हैं।
इतना ही नहीं पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने तो पाकिस्तान को उसके परमाणु कार्यक्रम के कारण दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में से एक तक कह दिया था, जिससे पूरी दुनिया में पाकिस्तान की भारी किरकिरी हुई थी।
पाकिस्तान की चार दिन की चांदनी...
गौरतलब है कि डोनाल्ड ट्रंप का मिजाज बेहद अप्रत्याशित और पलटने वाला है। ऐसे में आज जो जेडी वेंस पाकिस्तान की तारीफों के पुल बांध रहे हैं, कल अमेरिकी हित बदलते ही वे पाकिस्तान को दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंक सकते हैं।
ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की यह 'राजनयिक चमक' महज चार दिन की चांदनी है; जब तक वह अपनी जमीन से आतंकवाद का खात्मा नहीं करता, अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी वास्तविक 'थू-थू' बंद नहीं होने वाली।
Labels
Videsh
Post A Comment
No comments :