मानसून की पहली बारिश में ही तालाब बन जाते हैं भारत के शहर, क्यों है चीन-नीदरलैंड के स्पंज मॉडल से सीखने की जरूरत
मानसून की पहली बारिश में ही तालाब बन जाते हैं भारत के शहर, क्यों है चीन-नीदरलैंड के स्पंज मॉडल से सीखने की जरूरत
भारत में मानसून के दौरान शहरों में जलभराव एक गंभीर समस्या है, इस समस्या से निपटने के लिए आधुनिक शहरी नियोजन और स्पंज सिटी मॉडल को अपनाने की आवश्यकता ...और पढ़ें

शहरों में मानसून के दौरान जलभराव एक गंभीर वार्षिक समस्या।
कंक्रीट के जंगल और अवरुद्ध जल निकासी बाढ़ का कारण।
चीन-नीदरलैंड के 'स्पंज सिटी' मॉडल से सीखें समाधान।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत में मानसून आते ही जिस समस्या की शुरुआत सबसे पहले होती है, वह है जलभराव। भारत में हर साल जलभराव की समस्या अब आम हो गई है, सड़कों से लेकर घरों तक यह देखने को मिलता है। मानसून के दौरान जलभराव से गुजरना कई इलाकों में लोगों की आम दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है।
हर साल एक ही तरह की समस्या और घटनाएं देश में कमियों और कमजोरियां पर बड़े सवाल खड़े करती है। मानसून के दौरान कई समस्याएं सिस्टम और कमजोर तंत्र की पोल खोल देती हैं।
बड़े शहरों में बुरे हाल
देश के बड़े शहर मानसून की हल्की बारिश भी सहन नहीं कर पाते हैं। नोएडा और गुरुग्राम जैसे शहर की सड़कें कुछ ही घंटों की बारिश में तालाब में तब्दील हो जाती हैं। इतना ही नहीं हल्की बारिश या मानसून की पहली बारिश में सड़कें तक धंस जाती हैं। घंटों इन बड़ें शहरों में जाम लग जाता है।
मुंबई में स्थिति जस की तस
मुंबई शहर, जिसे मायानगरी कहा जाता है, मानसून के दौरान उसकी हालत दयनीय हो जाती है। पिछले कई सालों में मुंबई की जल निकासी में कोई खास बदलाव नहीं आया है। मुंबई के जिन इलाकों में हर साल बाढ़ आती हैं, वहां भी कोई सुधार नहीं हुआ। मुंबई के कई इलाके मानसून के दौरान जलमग्न हो जाते हैं।
हाईकोर्ट ने की बड़ी टिप्पणी
मुंबई शहर को जलभराव से मुक्त रखने की जिम्मेदारी सिर्फ नगर निगम के अधिकारियों पर ही नहीं है। मुंबई में जलभराव को लेकर बीएमसी की आलोचना के बीच, बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक मामले की समीक्षा करते हुए टिप्पणी करते हुए कहा कि मुंबई में बाढ़ के लिए नागरिक भी समान रूप से जिम्मेदार हैं। कोर्ट ने अतिक्रमण और जल निकासी का हवाला देते हुए का कि लोगों ने अपनी ही मातृभूमि को लूटा है, इसलिए शहर में जलभराव केवल नगर निकाय की समस्या नहीं है।
तेज बारिश से समस्या हो जाती है गंभीर
पुणे स्थित नागरिक विज्ञान केंद्र के सचिव और मानसून एवं समाज पर स्वतंत्र शोधकर्ता मयूरेश प्रभुने ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण जब एक घंटे में 100 मिमी जैसी भारी बारिश थोड़े-थोड़े समय में होती है, तो यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है। आधुनिक शहरी विकास के कारण ये ऐतिहासिक जलमार्ग भर गए हैं, अवरुद्ध हो गए हैं या उनके ऊपर निर्माण हो गया है, जिससे पानी के निकलने की कोई जगह नहीं बचती।
उन्होंने आगे कहा कि 20 साल पहले यह समस्या इतनी गंभीर नहीं थी। उस समय भी जलभराव होता था, लेकिन यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया थी जिसमें पानी निचले इलाकों में जमा होकर प्राकृतिक तालाब बना लेता था। ये तालाब क्यों बनते थे? क्योंकि पानी बहकर निकल नहीं पाता था और प्राकृतिक रूप से वहीं जमा हो जाता था। लेकिन अब स्थिति बदल गई है।
कंक्रीट के जंगल बन रहे शहर
वहीं जलभराव की समस्या को लेकर इंडिया रिसाइकल्स की संस्थापक रेणु पोखर्ना का मानना है कि भारत में शहरों की योजना अव्यवस्थित तरीके से बनाई गई है। उनका कहना है कि हम इस तरह के मॉडल अपना रहे हैं जो जलवायु के लिहाज से उपयुक्त नहीं है। कंक्रीट पानी को सोखता नहीं है, लेकिन हम फिर भी शहरों में लगातार कंक्रीट की सड़कें और फुटपाथ बना रहे हैं।
मानसून में कंक्रीट के चलते शहरों की सड़कें पानी से लबालब हो जाती है और गर्मियों में पानी सूख जाता है क्योंकि कंक्रीट ज्यादा गर्मी सोखता है। यहां जल स्त्रोतों को प्राकृतिक रूप से संरक्षित नहीं रहने देते, जब कोई नदी या तालाब सूखता है, तो हम उसे भूमि में परिवर्तित कर देते हैं। पानी के प्राकृतिक अवशोषकों पर कंक्रीट बिछा दिया जाता है, जिस वजह से पानी के निकलने की जगह नहीं बचती।
इतना ही नहीं निगर निकाय और प्राइवेट डेवलपर्स आवास वाली जगहों पर फुटपाथों और खुले आंगनों सहित पूरी जमीन को कंक्रीट से सील कर देते हैं। खुली मिट्टी न रहने की वजह से बारिश का पानी प्राकृतिक रूप से धरती में रिसने से रुक जाता है, इससे भूजल स्तर का पुनर्भरण बाधित होता है। विकास के रूप में यह सड़कें साफ-सुथरी दिखती हैं, लेकिन जल निकासी के मामले में यह अवरुद्ध है।
कैसे रोक सकते हैं जलभराव?
मानसून में जलभराव को रोकने के लिए शहरी डिजाइन को मौसमी और दशकों तक चलने वाली सक्रिय शहरी इंजीनियरिंग की ओर बढ़ना होगा। साथ ही नियमित रूप से नालियों की सफाई, बारिश की पानी की निकासी व्यवस्था का रखरखाव, भवन निर्माण नियमों को लागू करना होगा। साथ ही पुरानी हो चुकी जल निकासी प्रणालियों को आधुनिक भी करना होगा।
जलवायु परिवर्तन के कारण साल दर साल ज्यादा बारिश हो रही है, इसलिए मानसून में बाढ़ से निपटने के लिए आधुनिक शहर बनाने की तरफ बढ़ना होगा। शहरों का निर्माण इस तरह से हो जो पानी को आपदा बनने से पहले ही प्रबंधित कर सकें।
विदेशों में क्या है तकनीक
शहरी नीति के पैरोकार अर्घ्यदीप हटुआ के अनुसार, चीन के हांगकांग जैसे शहरों में भारतीय शहरों के बराबर या उससे ज्यादा बारिश होती है, लेकिन वे तेज बारिश के बाद तेजी से उबर जाते हैं। यहां अंतर बारिश का नहीं बल्कि बुनियादी ढांचों का नियमित रखरखाव और सख्त नियमों और प्राकृतिक जल निकासी प्रणालियों के संरक्षण का परिणाम है।
क्या है स्पंज सिटी कॉन्सेप्ट?
दुनियाभर के देश स्पंज सिटी की अवधारणा का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें बारिश के पानी को अवशोषित (Absorb) और वापस इस्तेमाल करने के लिए हरित छतों, फुटपाथों और शहरी आर्द्रभूमि का इस्तेमाल किया जाता है। इस सिद्धांत को चीन और नीदरलैंड जैसे देशों ने व्यापक रूप से अपनाया है. भारत को चीन और नीदरलैंड जैसे देशों से स्पंज सिटी मॉडल को सीखने और अपनाने की जरूरत है.
भारत में मानसून के दौरान शहरों में जलभराव एक गंभीर समस्या है, इस समस्या से निपटने के लिए आधुनिक शहरी नियोजन और स्पंज सिटी मॉडल को अपनाने की आवश्यकता ...और पढ़ें

शहरों में मानसून के दौरान जलभराव एक गंभीर वार्षिक समस्या।
कंक्रीट के जंगल और अवरुद्ध जल निकासी बाढ़ का कारण।
चीन-नीदरलैंड के 'स्पंज सिटी' मॉडल से सीखें समाधान।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत में मानसून आते ही जिस समस्या की शुरुआत सबसे पहले होती है, वह है जलभराव। भारत में हर साल जलभराव की समस्या अब आम हो गई है, सड़कों से लेकर घरों तक यह देखने को मिलता है। मानसून के दौरान जलभराव से गुजरना कई इलाकों में लोगों की आम दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है।
हर साल एक ही तरह की समस्या और घटनाएं देश में कमियों और कमजोरियां पर बड़े सवाल खड़े करती है। मानसून के दौरान कई समस्याएं सिस्टम और कमजोर तंत्र की पोल खोल देती हैं।
बड़े शहरों में बुरे हाल
देश के बड़े शहर मानसून की हल्की बारिश भी सहन नहीं कर पाते हैं। नोएडा और गुरुग्राम जैसे शहर की सड़कें कुछ ही घंटों की बारिश में तालाब में तब्दील हो जाती हैं। इतना ही नहीं हल्की बारिश या मानसून की पहली बारिश में सड़कें तक धंस जाती हैं। घंटों इन बड़ें शहरों में जाम लग जाता है।
मुंबई में स्थिति जस की तस
मुंबई शहर, जिसे मायानगरी कहा जाता है, मानसून के दौरान उसकी हालत दयनीय हो जाती है। पिछले कई सालों में मुंबई की जल निकासी में कोई खास बदलाव नहीं आया है। मुंबई के जिन इलाकों में हर साल बाढ़ आती हैं, वहां भी कोई सुधार नहीं हुआ। मुंबई के कई इलाके मानसून के दौरान जलमग्न हो जाते हैं।
हाईकोर्ट ने की बड़ी टिप्पणी
मुंबई शहर को जलभराव से मुक्त रखने की जिम्मेदारी सिर्फ नगर निगम के अधिकारियों पर ही नहीं है। मुंबई में जलभराव को लेकर बीएमसी की आलोचना के बीच, बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक मामले की समीक्षा करते हुए टिप्पणी करते हुए कहा कि मुंबई में बाढ़ के लिए नागरिक भी समान रूप से जिम्मेदार हैं। कोर्ट ने अतिक्रमण और जल निकासी का हवाला देते हुए का कि लोगों ने अपनी ही मातृभूमि को लूटा है, इसलिए शहर में जलभराव केवल नगर निकाय की समस्या नहीं है।
तेज बारिश से समस्या हो जाती है गंभीर
पुणे स्थित नागरिक विज्ञान केंद्र के सचिव और मानसून एवं समाज पर स्वतंत्र शोधकर्ता मयूरेश प्रभुने ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण जब एक घंटे में 100 मिमी जैसी भारी बारिश थोड़े-थोड़े समय में होती है, तो यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है। आधुनिक शहरी विकास के कारण ये ऐतिहासिक जलमार्ग भर गए हैं, अवरुद्ध हो गए हैं या उनके ऊपर निर्माण हो गया है, जिससे पानी के निकलने की कोई जगह नहीं बचती।
उन्होंने आगे कहा कि 20 साल पहले यह समस्या इतनी गंभीर नहीं थी। उस समय भी जलभराव होता था, लेकिन यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया थी जिसमें पानी निचले इलाकों में जमा होकर प्राकृतिक तालाब बना लेता था। ये तालाब क्यों बनते थे? क्योंकि पानी बहकर निकल नहीं पाता था और प्राकृतिक रूप से वहीं जमा हो जाता था। लेकिन अब स्थिति बदल गई है।
कंक्रीट के जंगल बन रहे शहर
वहीं जलभराव की समस्या को लेकर इंडिया रिसाइकल्स की संस्थापक रेणु पोखर्ना का मानना है कि भारत में शहरों की योजना अव्यवस्थित तरीके से बनाई गई है। उनका कहना है कि हम इस तरह के मॉडल अपना रहे हैं जो जलवायु के लिहाज से उपयुक्त नहीं है। कंक्रीट पानी को सोखता नहीं है, लेकिन हम फिर भी शहरों में लगातार कंक्रीट की सड़कें और फुटपाथ बना रहे हैं।
मानसून में कंक्रीट के चलते शहरों की सड़कें पानी से लबालब हो जाती है और गर्मियों में पानी सूख जाता है क्योंकि कंक्रीट ज्यादा गर्मी सोखता है। यहां जल स्त्रोतों को प्राकृतिक रूप से संरक्षित नहीं रहने देते, जब कोई नदी या तालाब सूखता है, तो हम उसे भूमि में परिवर्तित कर देते हैं। पानी के प्राकृतिक अवशोषकों पर कंक्रीट बिछा दिया जाता है, जिस वजह से पानी के निकलने की जगह नहीं बचती।
इतना ही नहीं निगर निकाय और प्राइवेट डेवलपर्स आवास वाली जगहों पर फुटपाथों और खुले आंगनों सहित पूरी जमीन को कंक्रीट से सील कर देते हैं। खुली मिट्टी न रहने की वजह से बारिश का पानी प्राकृतिक रूप से धरती में रिसने से रुक जाता है, इससे भूजल स्तर का पुनर्भरण बाधित होता है। विकास के रूप में यह सड़कें साफ-सुथरी दिखती हैं, लेकिन जल निकासी के मामले में यह अवरुद्ध है।
कैसे रोक सकते हैं जलभराव?
मानसून में जलभराव को रोकने के लिए शहरी डिजाइन को मौसमी और दशकों तक चलने वाली सक्रिय शहरी इंजीनियरिंग की ओर बढ़ना होगा। साथ ही नियमित रूप से नालियों की सफाई, बारिश की पानी की निकासी व्यवस्था का रखरखाव, भवन निर्माण नियमों को लागू करना होगा। साथ ही पुरानी हो चुकी जल निकासी प्रणालियों को आधुनिक भी करना होगा।
जलवायु परिवर्तन के कारण साल दर साल ज्यादा बारिश हो रही है, इसलिए मानसून में बाढ़ से निपटने के लिए आधुनिक शहर बनाने की तरफ बढ़ना होगा। शहरों का निर्माण इस तरह से हो जो पानी को आपदा बनने से पहले ही प्रबंधित कर सकें।
विदेशों में क्या है तकनीक
शहरी नीति के पैरोकार अर्घ्यदीप हटुआ के अनुसार, चीन के हांगकांग जैसे शहरों में भारतीय शहरों के बराबर या उससे ज्यादा बारिश होती है, लेकिन वे तेज बारिश के बाद तेजी से उबर जाते हैं। यहां अंतर बारिश का नहीं बल्कि बुनियादी ढांचों का नियमित रखरखाव और सख्त नियमों और प्राकृतिक जल निकासी प्रणालियों के संरक्षण का परिणाम है।
क्या है स्पंज सिटी कॉन्सेप्ट?
दुनियाभर के देश स्पंज सिटी की अवधारणा का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें बारिश के पानी को अवशोषित (Absorb) और वापस इस्तेमाल करने के लिए हरित छतों, फुटपाथों और शहरी आर्द्रभूमि का इस्तेमाल किया जाता है। इस सिद्धांत को चीन और नीदरलैंड जैसे देशों ने व्यापक रूप से अपनाया है. भारत को चीन और नीदरलैंड जैसे देशों से स्पंज सिटी मॉडल को सीखने और अपनाने की जरूरत है.
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