Zomato के डिलीवरी मॉडल में लगी बड़ी सेंध? सोशल मीडिया पर वायरल हुआ प्लेटफॉर्म फीस बचाने का नया'लूपहोल'
Zomato के डिलीवरी मॉडल में लगी बड़ी सेंध? सोशल मीडिया पर वायरल हुआ प्लेटफॉर्म फीस बचाने का नया'लूपहोल'
एक वायरल पोस्ट से Zomato के डिलीवरी मॉडल में एक संभावित लूपहोल के बारे में पता चला है। इस खामी के चलते Zomato असल में एक सब्सिडी वाली लॉजिस्टिक्स सर्व ...और पढ़ें

Zomato को इससे नुकसान हो सकता है। Photo- ChatGPT.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पहले ट्विटर) पर एक वायरल पोस्ट ने नेटिजन्स के बीच चिंता पैदा कर दी है। इस पोस्ट में Zomato के डिलीवरी मॉडल में एक संभावित लूपहोल होने का दावा किया गया है। ये ग्राहकों को एप-बेस्ड ऑर्डरिंग और डायरेक्ट पेमेंट को मिक्स करके प्लेटफॉर्म फीस और रेस्टोरेंट कमीशन से बचने की इजाजत देता है।
'प्रेम सोनी' नाम के एक यूजर द्वारा शेयर की गई इस पोस्ट में एक आसान से जुगाड़ के बारे में बताया गया है। एक ग्राहक जोमैटो के जरिए बहुत कम कीमत का ऑर्डर देता है- जैसे कि 40 रुपये की एक सिंगल रोटी, लेकिन इसी के साथ ही वह रेस्टोरेंट को सीधे फोन या WhatsApp पर एक बहुत बड़ा ऑर्डर दे देता है।
सोनी ने कहा, 'वह रेस्टोरेंट को सीधे कॉल करके छह रोटी, पनीर बटर मसाला, मलाई चाप, दाल मखनी और गुलाब जामुन का ऑर्डर देता है और उन्हें UPI पर पेमेंट कर देता है। फिर रेस्टोरेंट से कहता है कि सब कुछ उसी 1 रोटी वाले जोमैटो ऑर्डर के साथ पैक कर दें। जोमैटो राइडर उसे पिक करता है और घर पर डिलीवर कर देता है। राइडर को भनक तक नहीं लगती कि 40 रुपये के ऑर्डर के साथ 1,200 रुपये का खाना मुफ्त में सवारी कर रहा है।'
इसके रिजल्ट के तौर पर, ट्रांजैक्शन का एक बड़ा हिस्सा प्लेटफॉर्म के बाहर (ऑफ-प्लेटफॉर्म) होता है, जिससे ग्राहक और रेस्टोरेंट दोनों को ऑर्डर के बड़े हिस्से पर कमीशन, प्लेटफॉर्म फीस और टैक्स देने से बचने में मदद मिलती है।
हालांकि, हम ये समझ सकते हैं कि ये पैटर्न शायद छोटे शहरों में ज्यादा काम आता होगा, जहां आमतौर पर लोग एक दूसरे से परिचित होते हैं। और ये सिर्फ एक जोमैटो तक ही सीमित न हो।
इकोनॉमी पर इंपैक्ट
सोनी ने तर्क दिया कि इस तरह का बिहेवियर प्रभावी तौर पर जोमैटो को एक सब्सिडी वाली लॉजिस्टिक्स सर्विस (कूरियर सर्विस) में बदल देता है, जहां कंपनी डिलीवरी की लागत तो उठाती है लेकिन उसे एक्सपेक्टेड कमीशन का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही मिल पाता है।
दूसरी ओर, रेस्टोरेंट ऑर्डर के ऑफ-प्लेटफॉर्म वाले हिस्से पर पूरा मार्जिन अपने पास रखते हैं और एग्रीगेटर (जोमैटो) को दिए जाने वाले सामान्य 25-30 परसेंट के कट से बच जाते हैं। ग्राहकों को भी कम कीमतों का फायदा मिलता है और उन्हें कोई सर्ज चार्ज या प्लेटफॉर्म फीस नहीं देनी पड़ती।
सोनी ने चेतावनी देते हुए कहा, 'अगर ये तरीका फैल गया, तो फूड डिलीवरी का यूनिट इकोनॉमिक्स सिर्फ गिरेगा नहीं, बल्कि अंदर से पूरी तरह खोखला हो जाएगा।'
सोनी की इस पोस्ट को 10 लाख से ज्यादा व्यूज मिले और उनके इस दावे ने X पर एक बड़ी बहस छेड़ दी। यूजर्स ये सवाल उठा रहे हैं कि क्या ये लूपहोल बड़े पैमाने पर संभव है या जोमैटो द्वारा पहले से ही इस पर नजर रखी जा रही है।

मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ लोगों ने इससे बचाव के उपाय भी सुझाए, जैसे कि एप पर दिए गए ऑर्डर के साथ बिल का मिलान करना या फोटो-बेस्ड डिलीवरी कन्फर्मेशन को अनिवार्य करना। दूसरों ने ये भी ध्यान दिलाया कि अगर इस तरह के प्रैक्टिस को रिपोर्ट किया जाता है, तो रेस्टोरेंट्स को प्लेटफॉर्म से सस्पेंड या रिमूव किए जाने का जोखिम रहता है।
एक यूजर ने लिखा, 'यहां मेन बात डिलीवरी पर्सन की ईमानदारी और रेस्टोरेंट की जोखिम उठाने की इच्छा है।' Zomato ने अब तक इन दावों पर सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है।
जब जोमैटो ने 2023 में बंद किया था ऐसा ही एक लूपहोल
ये पहली बार नहीं है जब प्लेटफॉर्म के दुरुपयोग को लेकर चिंताएं सामने आई हैं। जनवरी 2023 में, एक वायरल LinkedIn पोस्ट ने जोमैटो के कैश-ऑन-डिवरी (COD) सिस्टम से जुड़े एक अलग लूपहोल को उजागर किया था, जिसमें सीधे तौर पर डिलीवरी पार्टनर्स शामिल थे।
उस मामले में, एक ग्राहक ने बताया था कि कैसे एक डिलीवरी एजेंट ने कीमत के एक छोटे से हिस्से में खाना पाने के लिए एक जुगाड़ का सजेशन दिया था। एजेंट ने कथित तौर पर ग्राहकों को COD ऑप्शन चुनने के लिए प्रोत्साहित किया और फिर 700 से 1,000 रुपये के ऑर्डर के लिए 200-300 रुपये की छोटी रकम लेने की बात कही, जबकि प्लेटफॉर्म पर डिलीवरी को 'नॉट कम्प्लीटेड' मार्क कर दिया।
ये लूपहोल इसलिए काम कर गया क्योंकि एक बार ऑर्डर को अनडिलीवर्ड मार्क कर दिए जाने के बाद प्लेटफॉर्म रिफंड की प्रोसेस शुरू कर देता था, जबकि खाना डिलीवरी पार्टनर के पास ही रहता था। इससे एजेंट को वही ऑर्डर सीधे ग्राहक को बेचने और कैश अपनी जेब में रखने की छूट मिल जाती थी।
ये मुद्दा तेजी से गरमाया और कई यूजर्स ने जोमैटो को होने वाले संभावित नुकसान और उसके डिलीवरी नेटवर्क में भरोसे के टूटने पर चिंता जताई। COD ऑर्डर्स के पिकअप के बाद कैंसिल होने पर भी रेस्टोरेंट्स को पेमेंट किया जाता था, जिसका मतलब था कि फाइनेंशियल बर्डन प्रभावी रूप से प्लेटफॉर्म पर ही पड़ता था।
इस पर सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया देते हुए, जोमैटो के को-फाउंडर दीपिंदर गोयल ने समस्या को स्वीकार किया था और कहा था कि कंपनी इस लूपहोल के बारे में जानती है और इसे 'बंद करने पर काम कर रही है।'
एक वायरल पोस्ट से Zomato के डिलीवरी मॉडल में एक संभावित लूपहोल के बारे में पता चला है। इस खामी के चलते Zomato असल में एक सब्सिडी वाली लॉजिस्टिक्स सर्व ...और पढ़ें

Zomato को इससे नुकसान हो सकता है। Photo- ChatGPT.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पहले ट्विटर) पर एक वायरल पोस्ट ने नेटिजन्स के बीच चिंता पैदा कर दी है। इस पोस्ट में Zomato के डिलीवरी मॉडल में एक संभावित लूपहोल होने का दावा किया गया है। ये ग्राहकों को एप-बेस्ड ऑर्डरिंग और डायरेक्ट पेमेंट को मिक्स करके प्लेटफॉर्म फीस और रेस्टोरेंट कमीशन से बचने की इजाजत देता है।
'प्रेम सोनी' नाम के एक यूजर द्वारा शेयर की गई इस पोस्ट में एक आसान से जुगाड़ के बारे में बताया गया है। एक ग्राहक जोमैटो के जरिए बहुत कम कीमत का ऑर्डर देता है- जैसे कि 40 रुपये की एक सिंगल रोटी, लेकिन इसी के साथ ही वह रेस्टोरेंट को सीधे फोन या WhatsApp पर एक बहुत बड़ा ऑर्डर दे देता है।
सोनी ने कहा, 'वह रेस्टोरेंट को सीधे कॉल करके छह रोटी, पनीर बटर मसाला, मलाई चाप, दाल मखनी और गुलाब जामुन का ऑर्डर देता है और उन्हें UPI पर पेमेंट कर देता है। फिर रेस्टोरेंट से कहता है कि सब कुछ उसी 1 रोटी वाले जोमैटो ऑर्डर के साथ पैक कर दें। जोमैटो राइडर उसे पिक करता है और घर पर डिलीवर कर देता है। राइडर को भनक तक नहीं लगती कि 40 रुपये के ऑर्डर के साथ 1,200 रुपये का खाना मुफ्त में सवारी कर रहा है।'
इसके रिजल्ट के तौर पर, ट्रांजैक्शन का एक बड़ा हिस्सा प्लेटफॉर्म के बाहर (ऑफ-प्लेटफॉर्म) होता है, जिससे ग्राहक और रेस्टोरेंट दोनों को ऑर्डर के बड़े हिस्से पर कमीशन, प्लेटफॉर्म फीस और टैक्स देने से बचने में मदद मिलती है।
हालांकि, हम ये समझ सकते हैं कि ये पैटर्न शायद छोटे शहरों में ज्यादा काम आता होगा, जहां आमतौर पर लोग एक दूसरे से परिचित होते हैं। और ये सिर्फ एक जोमैटो तक ही सीमित न हो।
इकोनॉमी पर इंपैक्ट
सोनी ने तर्क दिया कि इस तरह का बिहेवियर प्रभावी तौर पर जोमैटो को एक सब्सिडी वाली लॉजिस्टिक्स सर्विस (कूरियर सर्विस) में बदल देता है, जहां कंपनी डिलीवरी की लागत तो उठाती है लेकिन उसे एक्सपेक्टेड कमीशन का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही मिल पाता है।
दूसरी ओर, रेस्टोरेंट ऑर्डर के ऑफ-प्लेटफॉर्म वाले हिस्से पर पूरा मार्जिन अपने पास रखते हैं और एग्रीगेटर (जोमैटो) को दिए जाने वाले सामान्य 25-30 परसेंट के कट से बच जाते हैं। ग्राहकों को भी कम कीमतों का फायदा मिलता है और उन्हें कोई सर्ज चार्ज या प्लेटफॉर्म फीस नहीं देनी पड़ती।
सोनी ने चेतावनी देते हुए कहा, 'अगर ये तरीका फैल गया, तो फूड डिलीवरी का यूनिट इकोनॉमिक्स सिर्फ गिरेगा नहीं, बल्कि अंदर से पूरी तरह खोखला हो जाएगा।'
सोनी की इस पोस्ट को 10 लाख से ज्यादा व्यूज मिले और उनके इस दावे ने X पर एक बड़ी बहस छेड़ दी। यूजर्स ये सवाल उठा रहे हैं कि क्या ये लूपहोल बड़े पैमाने पर संभव है या जोमैटो द्वारा पहले से ही इस पर नजर रखी जा रही है।
मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ लोगों ने इससे बचाव के उपाय भी सुझाए, जैसे कि एप पर दिए गए ऑर्डर के साथ बिल का मिलान करना या फोटो-बेस्ड डिलीवरी कन्फर्मेशन को अनिवार्य करना। दूसरों ने ये भी ध्यान दिलाया कि अगर इस तरह के प्रैक्टिस को रिपोर्ट किया जाता है, तो रेस्टोरेंट्स को प्लेटफॉर्म से सस्पेंड या रिमूव किए जाने का जोखिम रहता है।
एक यूजर ने लिखा, 'यहां मेन बात डिलीवरी पर्सन की ईमानदारी और रेस्टोरेंट की जोखिम उठाने की इच्छा है।' Zomato ने अब तक इन दावों पर सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है।
जब जोमैटो ने 2023 में बंद किया था ऐसा ही एक लूपहोल
ये पहली बार नहीं है जब प्लेटफॉर्म के दुरुपयोग को लेकर चिंताएं सामने आई हैं। जनवरी 2023 में, एक वायरल LinkedIn पोस्ट ने जोमैटो के कैश-ऑन-डिवरी (COD) सिस्टम से जुड़े एक अलग लूपहोल को उजागर किया था, जिसमें सीधे तौर पर डिलीवरी पार्टनर्स शामिल थे।
उस मामले में, एक ग्राहक ने बताया था कि कैसे एक डिलीवरी एजेंट ने कीमत के एक छोटे से हिस्से में खाना पाने के लिए एक जुगाड़ का सजेशन दिया था। एजेंट ने कथित तौर पर ग्राहकों को COD ऑप्शन चुनने के लिए प्रोत्साहित किया और फिर 700 से 1,000 रुपये के ऑर्डर के लिए 200-300 रुपये की छोटी रकम लेने की बात कही, जबकि प्लेटफॉर्म पर डिलीवरी को 'नॉट कम्प्लीटेड' मार्क कर दिया।
ये लूपहोल इसलिए काम कर गया क्योंकि एक बार ऑर्डर को अनडिलीवर्ड मार्क कर दिए जाने के बाद प्लेटफॉर्म रिफंड की प्रोसेस शुरू कर देता था, जबकि खाना डिलीवरी पार्टनर के पास ही रहता था। इससे एजेंट को वही ऑर्डर सीधे ग्राहक को बेचने और कैश अपनी जेब में रखने की छूट मिल जाती थी।
ये मुद्दा तेजी से गरमाया और कई यूजर्स ने जोमैटो को होने वाले संभावित नुकसान और उसके डिलीवरी नेटवर्क में भरोसे के टूटने पर चिंता जताई। COD ऑर्डर्स के पिकअप के बाद कैंसिल होने पर भी रेस्टोरेंट्स को पेमेंट किया जाता था, जिसका मतलब था कि फाइनेंशियल बर्डन प्रभावी रूप से प्लेटफॉर्म पर ही पड़ता था।
इस पर सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया देते हुए, जोमैटो के को-फाउंडर दीपिंदर गोयल ने समस्या को स्वीकार किया था और कहा था कि कंपनी इस लूपहोल के बारे में जानती है और इसे 'बंद करने पर काम कर रही है।'
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