ईरान ने झुकने से किया इनकार', अमेरिका संग संभावित समझौते को बता रहा अपनी रणनीतिक जीत
ईरान ने झुकने से किया इनकार', अमेरिका संग संभावित समझौते को बता रहा अपनी रणनीतिक जीत
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को तेहरान अपनी रणनीतिक और राजनीतिक जीत के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। ईरान का मानना है कि उसने भारी दबाव क ...और पढ़ें

अमेरिका संग संभावित समझौते को ईरान बता रहा अपनी रणनीतिक जीत (इस्माइल बघाई फाइल फोटो- रॉयटर्स)
ईरान संभावित समझौते को अपनी रणनीतिक और राजनीतिक जीत मान रहा।
तेहरान ने भारी दबाव के बावजूद अमेरिका को बातचीत के लिए मजबूर किया।
आर्थिक संकट के बावजूद ईरान इसे घरेलू स्तर पर बड़ी सफलता मानेगा।
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की चर्चाओं के बीच तेहरान इसे अपनी रणनीतिक और राजनीतिक जीत के रूप में पेश करने में जुट गया है। ईरानी नेतृत्व और सरकारी मीडिया यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि भारी सैन्य और आर्थिक दबाव झेलने के बावजूद ईरान ने अमेरिका और इजरायल के सामने झुकने के बजाय बातचीत की राह मनवाई।
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने एक्स पर प्राचीन फारसी साम्राज्य के एक ऐतिहासिक चित्र का जिक्र करते हुए लिखा कि जिस तरह कभी रोमन साम्राज्य की अजेयता का भ्रम टूटा था, उसी तरह आज ईरान ने ताकतवर देशों के सामने झुकने से इनकार किया है। उनके इस बयान को मौजूदा अमेरिका-ईरान वार्ता से जोड़कर देखा जा रहा है।
किसे मिलेगा वास्तविक लाभ?
विशेषज्ञों का मानना है कि समझौते के अंतिम स्वरूप से पहले यह तय करना मुश्किल है कि वास्तविक लाभ किसे मिलेगा, लेकिन ईरान के पास इसे घरेलू और क्षेत्रीय स्तर पर जीत के तौर पर पेश करने का पर्याप्त मौका है।
बातचीत के जरिए समाधान
यूरोपियन काउंसिल आन फोरेन रिलेशंस की विश्लेषक एली गेरानमायेह के मुताबिक, दो महीने पहले ट्रंप “बिना शर्त आत्मसमर्पण” की बात कर रहे थे, लेकिन अब अमेरिका को बातचीत के जरिए समाधान तलाशना पड़ रहा है। उनके अनुसार, ईरान ने यह संदेश दिया है कि वह दो परमाणु शक्तियों — अमेरिका और इजरायल — के दबाव का सामना कर सकता है।
ईरान खुद को क्यों मान रहा मजूबत?
न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, विश्लेषकों का कहना है कि ईरान खुद को इसलिए भी मजबूत स्थिति में मान रहा है क्योंकि उसने होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी पकड़ और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित करने की क्षमता का प्रदर्शन किया। वहीं, अमेरिका और इजरायल के कई बड़े लक्ष्य पूरे नहीं हो सके।
ईरान के शीर्ष सैन्य नेताओं और सर्वोच्च नेता की हत्या के बावजूद वहां की सत्ता व्यवस्था कायम रही। इसके अलावा, संभावित समझौते में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम या उसके सहयोगी सशस्त्र गुटों पर किसी बड़ी शर्त का उल्लेख फिलहाल सामने नहीं आया है। हालांकि, ईरान की स्थिति पूरी तरह मजबूत भी नहीं मानी जा रही।
युद्ध और प्रतिबंधों के कारण देश गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। स्टील, पेट्रोकेमिकल और अन्य अहम उद्योगों को भारी नुकसान पहुंचा है। ऐसे में यदि समझौते के तहत ईरान को तेल निर्यात में राहत या विदेशों में जमे आर्थिक फंड तक पहुंच मिलती है, तो इसे तेहरान घरेलू स्तर पर बड़ी सफलता के रूप में पेश कर सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को तेहरान अपनी रणनीतिक और राजनीतिक जीत के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। ईरान का मानना है कि उसने भारी दबाव क ...और पढ़ें

अमेरिका संग संभावित समझौते को ईरान बता रहा अपनी रणनीतिक जीत (इस्माइल बघाई फाइल फोटो- रॉयटर्स)
ईरान संभावित समझौते को अपनी रणनीतिक और राजनीतिक जीत मान रहा।
तेहरान ने भारी दबाव के बावजूद अमेरिका को बातचीत के लिए मजबूर किया।
आर्थिक संकट के बावजूद ईरान इसे घरेलू स्तर पर बड़ी सफलता मानेगा।
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की चर्चाओं के बीच तेहरान इसे अपनी रणनीतिक और राजनीतिक जीत के रूप में पेश करने में जुट गया है। ईरानी नेतृत्व और सरकारी मीडिया यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि भारी सैन्य और आर्थिक दबाव झेलने के बावजूद ईरान ने अमेरिका और इजरायल के सामने झुकने के बजाय बातचीत की राह मनवाई।
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने एक्स पर प्राचीन फारसी साम्राज्य के एक ऐतिहासिक चित्र का जिक्र करते हुए लिखा कि जिस तरह कभी रोमन साम्राज्य की अजेयता का भ्रम टूटा था, उसी तरह आज ईरान ने ताकतवर देशों के सामने झुकने से इनकार किया है। उनके इस बयान को मौजूदा अमेरिका-ईरान वार्ता से जोड़कर देखा जा रहा है।
किसे मिलेगा वास्तविक लाभ?
विशेषज्ञों का मानना है कि समझौते के अंतिम स्वरूप से पहले यह तय करना मुश्किल है कि वास्तविक लाभ किसे मिलेगा, लेकिन ईरान के पास इसे घरेलू और क्षेत्रीय स्तर पर जीत के तौर पर पेश करने का पर्याप्त मौका है।
बातचीत के जरिए समाधान
यूरोपियन काउंसिल आन फोरेन रिलेशंस की विश्लेषक एली गेरानमायेह के मुताबिक, दो महीने पहले ट्रंप “बिना शर्त आत्मसमर्पण” की बात कर रहे थे, लेकिन अब अमेरिका को बातचीत के जरिए समाधान तलाशना पड़ रहा है। उनके अनुसार, ईरान ने यह संदेश दिया है कि वह दो परमाणु शक्तियों — अमेरिका और इजरायल — के दबाव का सामना कर सकता है।
ईरान खुद को क्यों मान रहा मजूबत?
न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, विश्लेषकों का कहना है कि ईरान खुद को इसलिए भी मजबूत स्थिति में मान रहा है क्योंकि उसने होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी पकड़ और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित करने की क्षमता का प्रदर्शन किया। वहीं, अमेरिका और इजरायल के कई बड़े लक्ष्य पूरे नहीं हो सके।
ईरान के शीर्ष सैन्य नेताओं और सर्वोच्च नेता की हत्या के बावजूद वहां की सत्ता व्यवस्था कायम रही। इसके अलावा, संभावित समझौते में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम या उसके सहयोगी सशस्त्र गुटों पर किसी बड़ी शर्त का उल्लेख फिलहाल सामने नहीं आया है। हालांकि, ईरान की स्थिति पूरी तरह मजबूत भी नहीं मानी जा रही।
युद्ध और प्रतिबंधों के कारण देश गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। स्टील, पेट्रोकेमिकल और अन्य अहम उद्योगों को भारी नुकसान पहुंचा है। ऐसे में यदि समझौते के तहत ईरान को तेल निर्यात में राहत या विदेशों में जमे आर्थिक फंड तक पहुंच मिलती है, तो इसे तेहरान घरेलू स्तर पर बड़ी सफलता के रूप में पेश कर सकता है।
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