जातिगत मुद्दों और खेल के बीच फंसी फिल्म, पावरफुल संदेश के बाद भी दिल को नहीं छू पाई कहानी
जातिगत मुद्दों और खेल के बीच फंसी फिल्म, पावरफुल संदेश के बाद भी दिल को नहीं छू पाई कहानी
राम चरण की फिल्म 'पेद्दी' सिनेमाघरों में आ चुकी है। इस स्पोर्ट्स ड्रामा फिल्म का सब्जेक्ट पावरफुल होने के बाद भी मेकर्स क्यों नहीं कर पाए कहानी के साथ ...और पढ़ें

रामचरण की फिल्म पेद्दी के किंग/ फोटो- Instagram
यह देश सिर्फ दो मौकों पर एकसाथ खड़ा होता है। पहला जंग के वक्त दूसरा खेल के वक्त। आपको लगता है हमने खेल खेला है। हमने जंग लड़ी है। फिल्म के नायक पेद्दी (राम चरण) का यह संवाद फिल्म के मूल विचार को व्यक्त कर रहा है। दरअसल, वह खेल के मैदान में अपनी पहचान बनाने से ज्यादा अपने गांव को पहचान दिलाने की लड़ाई लड़ रहा है। साथ ही फिल्म अहम संदेश देती है कि देश की असली पहचान उसके गांवों से है, इसलिए गांवों को छोड़ने के बजाय उन्हें विकसित किया जाना चाहिए।
बुच्ची बाबू सना की लिखी कहानी, स्क्रीनप्ले, संवाद का उद्देश्य अच्छा है। यहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने तीन अलग अलग खेलों यानी किक्रेट, कुश्ती और रेस का प्रयोग किया है लेकिन गरीबों पर जुल्म, गांववासियों के संघर्ष, सरकारी अफसरों की तानाशाही जैसे मुद्दों को समेटती यह फिल्म टुकड़ों-टुकड़ों में मनोरंजन करती है। यह पूर्ण रुप से प्रभावी नहीं बन पाई है।
क्या है राम चरण की 'पेद्दी' की कहानी?
कहानी दिहाड़ी मजदूर पेद्दी के इर्दगिर्द है, जिसे मजबूरी ने खिलाड़ी बनाया। उसका गांव सरकारी रिकॉर्ड में नहीं है। पेद्दी बेहतरीन गुड़ बनाने के साथ बेहतरीन किक्रेटर भी है। वह सिर्फ चौके और छक्के लगाता है। पेद्दी के गांव तक जाने के लिए सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। उसके गांव का एक शख्स तीस साल से प्रयास कर रहा है कि रेलगाड़ी उसके गांव पास एक मिनट के लिए रुक जाए।
इन प्रयासों के चलते उसकी जान भी चली जाती है। घटनाक्रम मोड़ लेते हैं और खेल के प्रति उसके लगाव को देखते हुए नायडू (शिव राजकुमार) उसे कुश्ती सीखने के लिए आमंत्रित करते हैं। वह नेशनल खेलने तक पहुंच जाता है, लेकिन पांव में चोट की वजह से खेल नहीं पाता। हालांकि, उसका सफर यहीं पर थमता नहीं है। वह अपने उद्देश्य को कैसे हासिल करता है कहानी इस संबंध में है।

कहीं भी दिल नहीं छू पाते हैं मुद्दे
मूल रूप से तेलुगु में बनी यह फिल्म दक्षिण भारतीय शैली में रची बसी है। यह फिल्म देखते हुए द कराटे किड, दंगल और चंदू चैंपियन की यादें भी ताजा कर देती है। बुच्ची बाबू सना ने निर्देशन के साथ कहानी, स्क्रीनप्ले, संवाद की कमान भी संभाली है। फिल्म खेल व्यवस्था पर तंज भी करती है। शुरुआत में संवाद है कि 'न तो हममें से कोई खेलता है, न अपने बच्चों को खेलने देते हैं फिर भी हम सारे खेलों का और खिलाडि़यों का भविष्य यहां चाय पीते पीते तय करते हैं'। यहां से लगता है कि कहानी दमदार होगी, लेकिन जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है, कई जगह लगता है कि अपने दिमाग का प्रयोग कतई न करें।
कहानी में जब जब खेल का मैदान आता है तो रोमांच आता है, लेकिन खेल खत्म होते ही वह फिसलने लगता है। आपसी रंजिश या टकराव के दृश्य दिलचस्प नहीं बन पाते हैं। फिल्म जातिगत भेदभाव के मुद्दे को भी छूती है। पेद्दी को बार-बार उसकी जाति के कारण अपमानित किया जाता है, लेकिन यह मुद्दे कहीं से भी दिल को छूते नहीं हैं।
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दिव्येंदु शर्मा का पात्र भी भटका हुआ सा लगता है। मूल मुद्दे को समुचित तरीके से फिल्म उठा नहीं पाती है। राजनीतिक परिवार से आने वाली जाह्नवी कपूर का पात्र 'अचियम्मा' बेहद कमजोर है। उसका चित्रण भी सम्मानजनक नहीं लगता है। एआर रहमान का संगीत सिनेमाघरों प्रभावी नहीं बन पाया है। श्रुति हसन के आइटम सॉन्ग के बोल स्तरहीन है।
'पेद्दी' में शोपीस बनकर रह गईं जाह्नवी कपूर
पेद्दी का भार मूल रूप से रामचरण के कंधों पर है। उन्हें यहां पर एक्शन, रोमांस, डांस के साथ तीन खेलों को खेलने का पूरा मौका मिला है। तीनों खेलों के लिए की गई उनकी मेहनत और शारीरिक कायांतरण स्क्रीन पर साफ झलकती है। खास तौर पर कुश्ती के दृश्य काफी रोमांचक बने हैं। वह अपनी भूमिका को पूरी शिद्दत से निभाते हैं। उनका डांस विशेष रुप से उल्लेखनीय है।
जाह्नवी कपूर ने संभवत: यह मूवी रामचरण जैसे स्टार के साथ फिल्म करने के लिए की होगी, लेकिन वह शोपीस बनकर रह गई है। ऐसी फिल्में उनके करियर को कहीं से भी ऊंचाई प्रदान नहीं करेंगी यह उन्हें समझना होगा। कुश्ती के उस्ताद की भूमिका में अभिनेता शिव कुमार का अभिनय सराहनीय है। संक्षिप्त भूमिका में रवि किशन कुछ खास रंग नहीं जमा पाते हैं।

रत्नवेलु की सिनेमैटोग्राफी फिल्म की बड़ी ताकत है। उन्होंने कुश्ती के अखाड़ों, गुड़ के कारखानों, गांव की धूलभरी गलियों और रात के दृश्यों को बहुत खूबसूरती से कैमरे में कैद किया है। चुस्त संपादन से एडिटर नवीन नूली फिल्म की अवधि को कम कर सकते थे। कुल मिलकार अगर पटकथा पर गहराई से काम किया जाता तो यह बेहतरीन मसाला फिल्म बन सकती थी।
राम चरण की फिल्म 'पेद्दी' सिनेमाघरों में आ चुकी है। इस स्पोर्ट्स ड्रामा फिल्म का सब्जेक्ट पावरफुल होने के बाद भी मेकर्स क्यों नहीं कर पाए कहानी के साथ ...और पढ़ें

रामचरण की फिल्म पेद्दी के किंग/ फोटो- Instagram
यह देश सिर्फ दो मौकों पर एकसाथ खड़ा होता है। पहला जंग के वक्त दूसरा खेल के वक्त। आपको लगता है हमने खेल खेला है। हमने जंग लड़ी है। फिल्म के नायक पेद्दी (राम चरण) का यह संवाद फिल्म के मूल विचार को व्यक्त कर रहा है। दरअसल, वह खेल के मैदान में अपनी पहचान बनाने से ज्यादा अपने गांव को पहचान दिलाने की लड़ाई लड़ रहा है। साथ ही फिल्म अहम संदेश देती है कि देश की असली पहचान उसके गांवों से है, इसलिए गांवों को छोड़ने के बजाय उन्हें विकसित किया जाना चाहिए।
बुच्ची बाबू सना की लिखी कहानी, स्क्रीनप्ले, संवाद का उद्देश्य अच्छा है। यहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने तीन अलग अलग खेलों यानी किक्रेट, कुश्ती और रेस का प्रयोग किया है लेकिन गरीबों पर जुल्म, गांववासियों के संघर्ष, सरकारी अफसरों की तानाशाही जैसे मुद्दों को समेटती यह फिल्म टुकड़ों-टुकड़ों में मनोरंजन करती है। यह पूर्ण रुप से प्रभावी नहीं बन पाई है।
क्या है राम चरण की 'पेद्दी' की कहानी?
कहानी दिहाड़ी मजदूर पेद्दी के इर्दगिर्द है, जिसे मजबूरी ने खिलाड़ी बनाया। उसका गांव सरकारी रिकॉर्ड में नहीं है। पेद्दी बेहतरीन गुड़ बनाने के साथ बेहतरीन किक्रेटर भी है। वह सिर्फ चौके और छक्के लगाता है। पेद्दी के गांव तक जाने के लिए सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। उसके गांव का एक शख्स तीस साल से प्रयास कर रहा है कि रेलगाड़ी उसके गांव पास एक मिनट के लिए रुक जाए।
इन प्रयासों के चलते उसकी जान भी चली जाती है। घटनाक्रम मोड़ लेते हैं और खेल के प्रति उसके लगाव को देखते हुए नायडू (शिव राजकुमार) उसे कुश्ती सीखने के लिए आमंत्रित करते हैं। वह नेशनल खेलने तक पहुंच जाता है, लेकिन पांव में चोट की वजह से खेल नहीं पाता। हालांकि, उसका सफर यहीं पर थमता नहीं है। वह अपने उद्देश्य को कैसे हासिल करता है कहानी इस संबंध में है।

कहीं भी दिल नहीं छू पाते हैं मुद्दे
मूल रूप से तेलुगु में बनी यह फिल्म दक्षिण भारतीय शैली में रची बसी है। यह फिल्म देखते हुए द कराटे किड, दंगल और चंदू चैंपियन की यादें भी ताजा कर देती है। बुच्ची बाबू सना ने निर्देशन के साथ कहानी, स्क्रीनप्ले, संवाद की कमान भी संभाली है। फिल्म खेल व्यवस्था पर तंज भी करती है। शुरुआत में संवाद है कि 'न तो हममें से कोई खेलता है, न अपने बच्चों को खेलने देते हैं फिर भी हम सारे खेलों का और खिलाडि़यों का भविष्य यहां चाय पीते पीते तय करते हैं'। यहां से लगता है कि कहानी दमदार होगी, लेकिन जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है, कई जगह लगता है कि अपने दिमाग का प्रयोग कतई न करें।
कहानी में जब जब खेल का मैदान आता है तो रोमांच आता है, लेकिन खेल खत्म होते ही वह फिसलने लगता है। आपसी रंजिश या टकराव के दृश्य दिलचस्प नहीं बन पाते हैं। फिल्म जातिगत भेदभाव के मुद्दे को भी छूती है। पेद्दी को बार-बार उसकी जाति के कारण अपमानित किया जाता है, लेकिन यह मुद्दे कहीं से भी दिल को छूते नहीं हैं।
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दिव्येंदु शर्मा का पात्र भी भटका हुआ सा लगता है। मूल मुद्दे को समुचित तरीके से फिल्म उठा नहीं पाती है। राजनीतिक परिवार से आने वाली जाह्नवी कपूर का पात्र 'अचियम्मा' बेहद कमजोर है। उसका चित्रण भी सम्मानजनक नहीं लगता है। एआर रहमान का संगीत सिनेमाघरों प्रभावी नहीं बन पाया है। श्रुति हसन के आइटम सॉन्ग के बोल स्तरहीन है।
'पेद्दी' में शोपीस बनकर रह गईं जाह्नवी कपूर
पेद्दी का भार मूल रूप से रामचरण के कंधों पर है। उन्हें यहां पर एक्शन, रोमांस, डांस के साथ तीन खेलों को खेलने का पूरा मौका मिला है। तीनों खेलों के लिए की गई उनकी मेहनत और शारीरिक कायांतरण स्क्रीन पर साफ झलकती है। खास तौर पर कुश्ती के दृश्य काफी रोमांचक बने हैं। वह अपनी भूमिका को पूरी शिद्दत से निभाते हैं। उनका डांस विशेष रुप से उल्लेखनीय है।
जाह्नवी कपूर ने संभवत: यह मूवी रामचरण जैसे स्टार के साथ फिल्म करने के लिए की होगी, लेकिन वह शोपीस बनकर रह गई है। ऐसी फिल्में उनके करियर को कहीं से भी ऊंचाई प्रदान नहीं करेंगी यह उन्हें समझना होगा। कुश्ती के उस्ताद की भूमिका में अभिनेता शिव कुमार का अभिनय सराहनीय है। संक्षिप्त भूमिका में रवि किशन कुछ खास रंग नहीं जमा पाते हैं।
रत्नवेलु की सिनेमैटोग्राफी फिल्म की बड़ी ताकत है। उन्होंने कुश्ती के अखाड़ों, गुड़ के कारखानों, गांव की धूलभरी गलियों और रात के दृश्यों को बहुत खूबसूरती से कैमरे में कैद किया है। चुस्त संपादन से एडिटर नवीन नूली फिल्म की अवधि को कम कर सकते थे। कुल मिलकार अगर पटकथा पर गहराई से काम किया जाता तो यह बेहतरीन मसाला फिल्म बन सकती थी।
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Mirchmasala
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