Physics Wallah के टीचर अलख पांडे ने शेयर की बचपन की यादें, बनारस की होली को बताया 'मदमस्त'
Physics Wallah के टीचर अलख पांडे ने शेयर की बचपन की यादें, बनारस की होली को बताया 'मदमस्त'
वेब शो 'हेलो बच्चों' अलख पांडे के जीवन पर आधारित है, जिसमें विनीत कुमार सिंह मुख्य भूमिका में हैं। विनीत ने अपने बचपन की यादें साझा कीं, जिसमें गणित क ...और पढ़ें
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स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। वेब शो ‘हेलो बच्चों’ (Hello Bacchon Series) इन दिनों चर्चा में है। यह शो प्रयागराज के चर्चित शिक्षक अलख पांडे (Alakh Pandey) के जीवन और उनके शैक्षिक संघर्षों से प्रेरित है, जिन्होंने ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से लाखों छात्रों के भविष्य को दिशा दी। इस शो में अभिनेता विनीत कुमार सिंह अलख पांडे की भूमिका निभा रहे हैं। अपने स्कूली दिनों को याद करते हुए विनीत कहते हैं, कि बिना मार पड़े तो जैसे पढ़ाई पूरी ही नहीं मानी जाती थी।
बचपन में गणित से लगता था डर
अलख ने बताया कि जिन शिक्षकों से मैंने पढ़ाई की, उनमें बहुत सारे शिक्षक ऐसे थे जिनक लिए बिना डांट-फटकार या मार के ज्ञान देना संभव ही नहीं था। मेरे पिता गणितज्ञ थे और उनका भी यही मानना था कि बिना पिटाई गणित नहीं आती। इसी कारण मैं बचपन में गणित से भागता था। (ठहाका मारते हैं)। हालांकि छावा अभिनेता का मानना है कि शिक्षक की भूमिका सिर्फ सख्ती तक सीमित नहीं होती। अगर जीवन में सही समय पर अच्छा शिक्षक मिल जाए तो वह आपकी जिंदगी संवार देता है।
क्लास में शर्मीले बच्चे थे अलख
जीवन के अलग-अलग पड़ाव पर मिले शिक्षकों के बारे में बात करते हुए विनीत कहते हैं कि जब मैं स्कूल में था तो वो घटना मुझे आज भी याद है। रौशनी फ्लिप्स प्रिंसिपल भी थी और इंग्लिश पढ़ाती थी। बचपन की वो घटना मुझे याद है कि सबको कुछ ना कुछ परफार्म करना था। शुरुआत में मैं बहुत शर्मिला बच्चा होता था। तो मैं आगे नहीं आ रहा था। उन्होंने मुझे कहा कि तुमको कुछ करना है और उनसे लोग थोड़ा सा डरते भी थे तो मुझे ये प्रेशर था कि कुछ नहीं करना है, लेकिन करूं तो क्या करूं। हमेशा देखता ही था, लोग परफार्म कर रहे हैं। पांचवीं क्लास तक ऐसा ही था। तो मैंने ऐसे ही कुछ परफार्म किया। तो ना फर्स्ट प्राइज मिली, ना सेकेंड। थर्ड प्राइज पर टाई हो गया। मैं था और कोई दूसरा बच्चा था। तो थर्ड प्राइज मुझे मिला नहीं क्योंकि तभी ऐसा नहीं होता था कि चलो टाई है तो दो लोगों को दे देते हैं, दूसरे बच्चे को मिला। उन्होंने मेरे लिए आइसक्रीम मंगवाई और वो आइसक्रीम उन्होंने बैठा के मुझे खिलाया है और बहुत सारी चीजें कहीं।
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अपने डर से बाहर निकलने की जरूरत
मुझे बातें तो याद नहीं हैं, लेकिन वो घटना मुझे छू गई कि जब आप कोशिश करते हैं तो आप अपने डर और काम्प्लेक्स से बाहर निकलते हैं। आज जीवन में जब भी कभी ऐसा होता है कि अगर मुझे अपनी पसंद की चीज नहीं मिलती तो वो आइसक्रीम याद आ जाती है। फिर मुझे ये पता होता है कि एक दिन मैं यहां पहुंच जाऊंगा। हालांकि बहुत सारे पुरस्कार मुझे मिले हैं, लेकिन वो ट्रिगर वहां उस घटना से आया। फिर जब कॉलेज में आया तो बास्केटबॉल खेलता था तो हमारे कोच थे अमरजीत सिंह सर। उन्होंने अनुशासन और टीमवर्क का महत्व समझाया। जब जीवन की जिम्मेदारियां बढ़ी तो पापा की बहुत सारी बातें समझ में आई। कहते हैं न घर की मुर्गी दाल बराबर तो उनकी बातें बाद में बेहतर तरीके से समझ आई। जैसे हारिये न हिम्मत बिसारिये न राम। मैं कभी अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं करता, अपनी लड़ाइयां खुद से लड़ने की कोशिश होती है लेकिन उन्हें आभास हो जाता है।
पिता की बातें हमेशा देती हैं हिम्मत
खैर, उनकी कही बातें हमेशा मेरे साथ रहती है मुझे हमेशा हिम्मत देती हैं। इसीलिए कहते हैं शिक्षक बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। कहा गया है गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय। शो में अलख पांडे के संघर्ष और समर्पण को भी इसी नजरिये से दिखाया गया है। बनारस से ताल्लुक रखने वाले विनीत बताते हैं कि अलख पांडे सर बेहद सरल और विनम्र इंसान हैं, लेकिन उनका काम असाधारण है। आर्थिक कठिनाइयों के कारण वे खुद इंजीनियरिंग नहीं कर पाए, इसलिए उन्होंने ऐसे छात्रों तक शिक्षा पहुंचाने का संकल्प लिया जो पैसों के अभाव में पढ़ नहीं पाते। उनकी पहल ने लाखों छात्रों की जिंदगी बदल दी। कई छात्रों को प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में सफलता मिली और उनके जीवन की दिशा बदल गई।
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होली को लेकर रहता है अलग उत्साह
विनीत मानते हैं कि शिक्षक से बड़ा योगदान शायद ही कोई और दे सकता है, क्योंकि वही भविष्य गढ़ता है। यह शो होली के आसपास, 6 मार्च को नेटफ्लिक्स पर रिलीज होने जा रहा है। इस मौके पर विनीत ने बनारस की होली कीयादें भी साझा कीं। वे कहते हैं, वहां होली से पहले पुरानी टीशर्ट और पुरानी पैंट निकाल लिए जाते थे। उन्हें दो-तीन दिन पहले धो लिया जाता था। उनमें ही होली खेली जाती थी क्योंकि फिर वो किसी काम का नहीं रहेगा। (हंसते हुए) होली खेलते हुए कई बार कपड़ा फाड़ भी दिया जाता था। बनारस की होली ऐसे मदमस्त करने वाली कि क्या कहें। वो कहा जाता है कि बुरा न मानो होली है तो वहां पर सच में लागू ही होता है। रंग, मस्ती और अपनापन सब कुछ दिल खोलकर होता है।
वेब शो 'हेलो बच्चों' अलख पांडे के जीवन पर आधारित है, जिसमें विनीत कुमार सिंह मुख्य भूमिका में हैं। विनीत ने अपने बचपन की यादें साझा कीं, जिसमें गणित क ...और पढ़ें

स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। वेब शो ‘हेलो बच्चों’ (Hello Bacchon Series) इन दिनों चर्चा में है। यह शो प्रयागराज के चर्चित शिक्षक अलख पांडे (Alakh Pandey) के जीवन और उनके शैक्षिक संघर्षों से प्रेरित है, जिन्होंने ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से लाखों छात्रों के भविष्य को दिशा दी। इस शो में अभिनेता विनीत कुमार सिंह अलख पांडे की भूमिका निभा रहे हैं। अपने स्कूली दिनों को याद करते हुए विनीत कहते हैं, कि बिना मार पड़े तो जैसे पढ़ाई पूरी ही नहीं मानी जाती थी।
बचपन में गणित से लगता था डर
अलख ने बताया कि जिन शिक्षकों से मैंने पढ़ाई की, उनमें बहुत सारे शिक्षक ऐसे थे जिनक लिए बिना डांट-फटकार या मार के ज्ञान देना संभव ही नहीं था। मेरे पिता गणितज्ञ थे और उनका भी यही मानना था कि बिना पिटाई गणित नहीं आती। इसी कारण मैं बचपन में गणित से भागता था। (ठहाका मारते हैं)। हालांकि छावा अभिनेता का मानना है कि शिक्षक की भूमिका सिर्फ सख्ती तक सीमित नहीं होती। अगर जीवन में सही समय पर अच्छा शिक्षक मिल जाए तो वह आपकी जिंदगी संवार देता है।
क्लास में शर्मीले बच्चे थे अलख
जीवन के अलग-अलग पड़ाव पर मिले शिक्षकों के बारे में बात करते हुए विनीत कहते हैं कि जब मैं स्कूल में था तो वो घटना मुझे आज भी याद है। रौशनी फ्लिप्स प्रिंसिपल भी थी और इंग्लिश पढ़ाती थी। बचपन की वो घटना मुझे याद है कि सबको कुछ ना कुछ परफार्म करना था। शुरुआत में मैं बहुत शर्मिला बच्चा होता था। तो मैं आगे नहीं आ रहा था। उन्होंने मुझे कहा कि तुमको कुछ करना है और उनसे लोग थोड़ा सा डरते भी थे तो मुझे ये प्रेशर था कि कुछ नहीं करना है, लेकिन करूं तो क्या करूं। हमेशा देखता ही था, लोग परफार्म कर रहे हैं। पांचवीं क्लास तक ऐसा ही था। तो मैंने ऐसे ही कुछ परफार्म किया। तो ना फर्स्ट प्राइज मिली, ना सेकेंड। थर्ड प्राइज पर टाई हो गया। मैं था और कोई दूसरा बच्चा था। तो थर्ड प्राइज मुझे मिला नहीं क्योंकि तभी ऐसा नहीं होता था कि चलो टाई है तो दो लोगों को दे देते हैं, दूसरे बच्चे को मिला। उन्होंने मेरे लिए आइसक्रीम मंगवाई और वो आइसक्रीम उन्होंने बैठा के मुझे खिलाया है और बहुत सारी चीजें कहीं।
अपने डर से बाहर निकलने की जरूरत
मुझे बातें तो याद नहीं हैं, लेकिन वो घटना मुझे छू गई कि जब आप कोशिश करते हैं तो आप अपने डर और काम्प्लेक्स से बाहर निकलते हैं। आज जीवन में जब भी कभी ऐसा होता है कि अगर मुझे अपनी पसंद की चीज नहीं मिलती तो वो आइसक्रीम याद आ जाती है। फिर मुझे ये पता होता है कि एक दिन मैं यहां पहुंच जाऊंगा। हालांकि बहुत सारे पुरस्कार मुझे मिले हैं, लेकिन वो ट्रिगर वहां उस घटना से आया। फिर जब कॉलेज में आया तो बास्केटबॉल खेलता था तो हमारे कोच थे अमरजीत सिंह सर। उन्होंने अनुशासन और टीमवर्क का महत्व समझाया। जब जीवन की जिम्मेदारियां बढ़ी तो पापा की बहुत सारी बातें समझ में आई। कहते हैं न घर की मुर्गी दाल बराबर तो उनकी बातें बाद में बेहतर तरीके से समझ आई। जैसे हारिये न हिम्मत बिसारिये न राम। मैं कभी अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं करता, अपनी लड़ाइयां खुद से लड़ने की कोशिश होती है लेकिन उन्हें आभास हो जाता है।
पिता की बातें हमेशा देती हैं हिम्मत
खैर, उनकी कही बातें हमेशा मेरे साथ रहती है मुझे हमेशा हिम्मत देती हैं। इसीलिए कहते हैं शिक्षक बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। कहा गया है गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय। शो में अलख पांडे के संघर्ष और समर्पण को भी इसी नजरिये से दिखाया गया है। बनारस से ताल्लुक रखने वाले विनीत बताते हैं कि अलख पांडे सर बेहद सरल और विनम्र इंसान हैं, लेकिन उनका काम असाधारण है। आर्थिक कठिनाइयों के कारण वे खुद इंजीनियरिंग नहीं कर पाए, इसलिए उन्होंने ऐसे छात्रों तक शिक्षा पहुंचाने का संकल्प लिया जो पैसों के अभाव में पढ़ नहीं पाते। उनकी पहल ने लाखों छात्रों की जिंदगी बदल दी। कई छात्रों को प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में सफलता मिली और उनके जीवन की दिशा बदल गई।
होली को लेकर रहता है अलग उत्साह
विनीत मानते हैं कि शिक्षक से बड़ा योगदान शायद ही कोई और दे सकता है, क्योंकि वही भविष्य गढ़ता है। यह शो होली के आसपास, 6 मार्च को नेटफ्लिक्स पर रिलीज होने जा रहा है। इस मौके पर विनीत ने बनारस की होली कीयादें भी साझा कीं। वे कहते हैं, वहां होली से पहले पुरानी टीशर्ट और पुरानी पैंट निकाल लिए जाते थे। उन्हें दो-तीन दिन पहले धो लिया जाता था। उनमें ही होली खेली जाती थी क्योंकि फिर वो किसी काम का नहीं रहेगा। (हंसते हुए) होली खेलते हुए कई बार कपड़ा फाड़ भी दिया जाता था। बनारस की होली ऐसे मदमस्त करने वाली कि क्या कहें। वो कहा जाता है कि बुरा न मानो होली है तो वहां पर सच में लागू ही होता है। रंग, मस्ती और अपनापन सब कुछ दिल खोलकर होता है।
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Mirchmasala
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