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बावड़ी हादसे का एक वर्ष,12 माह भी प्रशासन के हाथ खाली, नहीं सुधरा हमारा आपदा प्रबंधन

बावड़ी हादसे का एक वर्ष,12 माह भी प्रशासन के हाथ खाली, नहीं सुधरा हमारा आपदा प्रबंधन

बावड़ी हादसे का एक वर्ष

HIGHLIGHTSजिस स्लैब के टूटने से 36 लोगों की जान गई, वह किसकी जिम्मेदारी थी, आज तक तय नहीं
बेलेश्वर महादेव मंदिर हादसे को आज यानी 30 मार्च को एक वर्ष पूरा हो रहा है।
पुलिस ने बावड़ी हादसे में बेलेश्वर महादेव झूलेलाल मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष सेवाराम गलानी और सचिव मुरली सबनानी को गिरफ्तार किया।

 बेलेश्वर महादेव मंदिर हादसे को आज यानी 30 मार्च को एक वर्ष पूरा हो रहा है। हादसे में 36 जानें गई थीं। अपनों को खोने वाले न्याय के लिए भटक रहे हैं। राज्य और केंद्र शासन ने मिलकर प्रत्येक मृतक के स्वजन को सात लाख रुपये की आर्थिक सहायता तो की लेकिन आहत स्वजन का कहना है कि यह न्याय नहीं, बल्कि न्याय का सिर्फ दिखावा भर है।

न्यायालय को दिखाने के लिए पुलिस ने बेलेश्वर महादेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष और सचिव को गिरफ्तार तो कर लिया, लेकिन इस बात का जवाब किसी के पास नहीं है कि नगर निगम, आइडीए और प्रशासन के किसी भी अधिकारी के खिलाफ आपराधिक प्रकरण क्यों दर्ज नहीं किया गया, जबकि मजिस्ट्रियल जांच में सचिव, अध्यक्ष के साथ निगम के अधिकारियों को भी हादसे के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। बावजूद इसके उन्हें क्लीन चिट कैसे दे दी गई।



रहवासियों का कहना है कि वर्ष 1984 में बावड़ी पर किसी शासकीय एजेंसी ने स्लैब डाला था। उस वक्त मंदिर, बावड़ी सब कुछ आइडीए के कब्जे में था। वर्ष 1994 में मंदिर, बगीचा, बावड़ी निगम को हस्तांतरित हुए। इधर, आइडीए और निगम दोनों ही बावड़ी पर स्लैब डालने से इन्कार कर रहे हैं यानी जिस स्लैब के टूटने की वजह से 36 लोगों ने अपनी जान गंवाई, वह किसकी जिम्मेदारी थी, यह आज भी तय नहीं है।

नोटिस के जवाब की वजह से फंसे अध्यक्ष-सचिव

पुलिस ने बावड़ी हादसे में बेलेश्वर महादेव झूलेलाल मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष सेवाराम गलानी और सचिव मुरली सबनानी को गिरफ्तार किया। दोनों फिलहाल जेल में हैं। राजस्व रिकार्ड में वर्ष 1970 तक बावड़ी का उल्लेख मिलता है। इसके बाद से यह रिकार्ड में नहीं है। उस वक्त यह क्षेत्र स्कीम 31 के तहत आता था। रहवासियों के मुताबिक बावड़ी पर स्लैब वर्ष 1984 में किसी शासकीय एजेंसी ने डाला थी, जबकि बेलेश्वर महादेव झूलेलाल मंदिर ट्रस्ट की स्थापना सितंबर 2018 में की गई थी।

बावजूद इसके ट्रस्ट के अध्यक्ष और सचिव के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया। जानकारों का कहना है कि 22 जनवरी 2022 ट्रस्ट द्वारा दिए गए नगर निगम के नोटिस का जवाब ही सचिव और अध्यक्ष की गिरफ्तारी की वजह बना है। अवैध निर्माण को लेकर मिले निगम के नोटिस के जवाब में अध्यक्ष और सचिव ने कहा था कि मंदिर का निर्माण जनकल्याण के लिए किया जा रहा है।

निर्माण के बाद मूर्तियां शिफ्ट कर दी जाएंगी और बावड़ी को खोला जाएगा। इससे पानी की सुविधा हो जाएगी। यानी उनकी संज्ञान में था कि उक्त स्थान पर बावड़ी है। बावजूद इसके उन्होंने 30 मार्च 2023 को बावड़ी के ऊपर हवन की अनुमति दी और लोगों को जमा होने दिया।



डेढ़ घंटे बाद पहुंचा था बचाव दल

30 मार्च 2023 से शुरू हुआ रेस्क्यू आपरेशन करीब 36 घंटे चला था। घटना सुबह करीब 11.30 बजे की थी। रेस्क्यू आपरेशन घटना के करीब डेढ घंटे बाद शुरू हुआ था। रहवासियों का कहना है कि उन्होंने पुलिस और प्रशासन को घटना की जानकारी तुरंत दे दी थी। तत्कालीन कलेक्टर इलैया राजा टी तो तत्काल मौके पर पहुंच गए, न रेस्क्यू टीम नहीं पहुंची। रेस्क्यू टीम पहुंचने तक कई मौत हो चुकी थी। समय रहते बचाव कार्य शुरू हो जाता तो कुछ लोगों को बचाया जा सकता था।

आज भी एनडीआरएफ के भरोसे 40 लाख लोगों की जान

- 40 लाख की जनसंख्या वाले शहर में फायर ब्रिगेड के पास खुद का बचाव दल और संसाधन नहीं है। बचाव आपरेशन के लिए फायर ब्रिगेड को एनडीआरएफ की मदद लेनी पड़ती है।

- हादसे के 12 महीने बाद भी संसाधनों में कोई इजाफा नहीं हुआ। आज भी फायर ब्रिगेड के पास आक्सीजन मास्क, गम बूट, फायर सूट जैसे जरूरी संसाधन नहीं हैं। वर्षों पुराने संसाधनों से बचाव कार्य किया जा रहा है।

- गहराई में फंसे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए हाइड्रोलिक क्रेन की जरूरत वर्षों से बताई जा रही है लेकिन आज भी पुराने रस्से के भरोसे व्यवस्था चल रही है। बावड़ी कांड में घंटों तक रस्सों के भरोसे बचाव काम चलता रहा।

2.62 करोड़ रुपये से हुआ था बगीचे का जीर्णोद्धार, आज है बदहाल

बावड़ी से लगकर बने बगीचे के विकास पर 2 करोड़ 62 लाख रुपये का खर्च आया था। रहवासियों और नगर निगम आपसी सहयोग से इसकी व्यवस्था संभाले थे। सुरक्षा के लिए बगीचे के चारों तरफ दीवार बनाई गई थी। हादसे के बाद से यह बगीचा उजाड़ पड़ा है। रहवासियों का कहना है कि हादसे के बाद बगीचे को लावारिस छोड़ दिया गया जबकि पार्षद का कार्यालय बगीचे परिसर में ही है।

कुछ सवाल जिनके नहीं मिले जवाब

-रहवासियों का कहना है कि नगर निगम ने ट्रस्ट को नोटिस सिर्फ निर्माणाधीन मंदिर के अवैध होने को लेकर दिया था। ट्रस्ट ने अपने जवाब में बता दिया था कि परिसर में पुरानी बावड़ी है। बावजूद इसके निगम ने बावड़ी को खोलने के प्रयास नहीं किए।

-मंदिर का निर्माण जिसे अवैध बताकर तोड़ा गया एक दिन में तैयार नहीं हुआ था। डेढ़ वर्ष से निर्माण चल रहा था। निगम के अधिकारियों ने इस दौरान निर्माण रुकवाने के लिए कुछ क्यों नहीं किया। लापरवाही बरतने वाले निगम के अधिकारी के खिलाफ आपराधिक प्रकरण क्यों दर्ज नहीं किया गया।
-तत्कालीन मुख्यमंत्री ने रहवासियों के समक्ष घोषणा की थी कि शासन अपने खर्च पर मंदिर का दोबारा निर्माण करेगा, लेकिन आज तक मंदिर का निर्माण क्यों नहीं हुआ।

-निर्माणाधीन मंदिर को जमींदोज करने के लिए तोड़ी गई दीवार और उजाड़े बगीचे का जीर्णोद्धार अब तक क्यों नहीं किया गया।

कैसे बीता एक साल हम ही जानते हैं
बावड़ी हादसे में पत्नी दक्षा, पुत्रवधू कनक सहित परिवार के चार लोगों को खोने वाले लक्ष्मीकांत पटेल हादसे की बात छिड़ते ही भावुक हो जाते हैं। वे बताते हैं कि उस दिन रामनवमी का उत्साह चरम पर था। पत्नी, बहू और दोनों काकियां नियमित रूप से मंदिर जाती थीं। उस दिन भी वे सुबह से ही वहां थीं। हादसे से कुछ देर पहले वे स्वयं भी वहीं थे। पंडितजी ने कहा था कि हवन की पूर्णाहूति के वक्त सभी लोग एक बार फिर आकर पूर्णाहूति डाल देना। यही वजह थी कि सुबह करीब 11.30 बजे मंदिर में भीड़ बढ़ गई थी। हादसे में जिसका नुकसान होना था हो गया। आज वो हमारे साथ नहीं है, लेकिन उनकी यादें हमेशा हमारे साथ रहेंगी। एक दिन भी ऐसा नहीं बीता जब उन्हें याद न किया हो। यह एक वर्ष हमने कैसे बिताया है यह सिर्फ हम ही जानते हैं।

काश भैया ने फोन उठा लिया होता

हादसे में बड़े भाई सुरेश गुलानी और भतीजे लोकेश गुलानी को खो चुके महेश हादसे को याद कर सिहर उठते हैं। उन्होंने बताया कि भैया नियमित रूप से बेलेश्वर महादेव मंदिर दर्शन के लिए जाते थे। उस दिन भी वे बेटे लोकेश और पत्नी माया के साथ वहां गए थे। सुबह करीब 11.15 बजे एक जरूरी काम से मैंने उनके मोबाइल पर काल किया था, लेकिन वे हवन में बैठे थे। शायद इसलिए उन्होंने मोबाइल नहीं उठाया। इसके थोड़ी देर बाद ही हादसा हो गया। भैया, भाभी और भतीजा तीनों बावड़ी में गिर गए। हादसे की सूचना मिलते ही मैं मौके पर पहुंचा तो वहां अफरा-तफरी मची हुई थी। वहां मौजूद लोगों से जब मैंने भैया के बारे में पूछा तो उन्होंने मुझे एक झोला दिखाया जो भैया का था। हादसे में भाभी तो जैसे-तैसे बच गईं, लेकिन भैया और भतीजा हमेशा के लिए दूर हो गए। हादसे के बाद परिवार आज भी सामान्य नहीं हो सका। इस बात का दुख है कि काश उस समय भैया ने फोन उठा लिया होता तो शायद आज वो मेरे साथ होते।

हादसे ने बदल दी जिंदगी

हादसे ने हमारे परिवार की जिंदगी पूरी तरह से बदल दी है। उस वक्त मैं अपना करियर बनाने में लगा था, लेकिन हादसे के बाद अब पूरी तरह से पिता के व्यवसाय को संभाल लिया है। यह कहना है पिता सुनील सोलंकी को खोने वाले सात्विक का। उनका कहना है कि हादसा हमें पूरी जीवन का जख्म दे गया। पिता का शव सबसे अंत में निकाला जा सका था। आज भी 30 और 31 मार्च 2023 का वह मंजर आंखों के सामने है। मां अर्चना हादसे के बाद टूट गई हैं। उनकी आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे।

काश बेटे को साथ ले जाता

हादसे में 11 वर्षीय बेटे सोमेश को खो चुके कमल खत्री को आज भी इस बात का गम है कि वे बेटे को मंदिर में छोड़कर क्यों गए। हादसे के कुछ देर पहले ही उन्होंने मित्र महेश से कहा था कि दुकान पर गाड़ी भरवाना है। मैं कुछ ही देर में वापस आता हूं। बेटा सोमेश हवन में बैठा है। खत्री दुकान पर पहुंचकर शटर खोल ही रहे थे कि हादसे की सूचना आ गई। वे बदहवास मौके पर पहुंचे लेकिन तब तक सबकुछ खत्म हो चुका था।
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