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Jeevan Ya Bheema Con Review: 2 करोड़ के इंश्योरेंस स्कैम की अनोखी कहानी, कागज पर थी हिट; पर्दे पर हुआ बंटाधार

Jeevan Ya Bheema Con Review: 2 करोड़ के इंश्योरेंस स्कैम की अनोखी कहानी, कागज पर थी हिट; पर्दे पर हुआ बंटाधार

अरशद वारसी की कॉमेडी टाइमिंग की हमेशा सराहना होती है। हाल ही में वह फिल्म 'जीवन या भीमा कॉन' के ...और पढ़ें


'जीवन या भीमा कॉन' रिव्यू/ फोटो- जागरण फोटो

मिर्जापुर के साथ हुई जीवन या भीमा कॉन की टक्कर


अनोखी कहानी के बाद कहां ढीली पड़ी फिल्म


अरशद वारसी की कॉमेडी टाइमिंग भी नहीं बचा पाई मूवी



स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। कर्ज में डूबा एक आदमी अपने हमशक्ल की मौत का फर्जीवाड़ा रचकर करोड़ों की इंश्योरेंस पॉलिसी हथियाने की साजिश करता है, लेकिन उसकी योजना में तब पेंच फंसता है, जब एक छुटभैया गैंगस्टर की एंट्री हो जाती है। इसके बाद शुरू होती है पहचान, लालच और रिश्‍तों में विश्‍वास की ऐसी उलझन, जो सुनने में किसी मजेदार कॉमेडी का वादा करती है।


‘जीवन या भीमा कॉन?’ का यह आइडिया कागज पर वाकई दिलचस्प लगा होगा, लेकिन बड़े पर्दे पर पहुंचते-पहुंचते इसकी सारी चमक उतर जाती है। लगता है, लेखक ने बीमा पॉलिसी तो याद रखी, मगर मनोरंजन का बीमा कराना भूल गए। डार्क कॉमेडी के तौर पर प्रचारित इस फिल्‍म की न तो घटनाएं उत्सुकता पैदा करते हैं, न किरदार बांध पाते हैं और न ही हंसा पाते है। अगर स्क्रिप्‍ट पर गहराई से काम किया गया होता तो यह बेहतरीन आइडिया था।



किस बारे में है जीवन या भीमा की कहानी?

कहानी की शुरुआत पुणे में किराए के मकान में रहने वाले जीवन (अरशद वारसी) के निधन से आरंभ होती है। फिर पता चलता है कि वह जिंदा है। मृतक उसका हमशक्‍ल भीमा था। जीवन की नर्स पत्‍नी योजना (संजीदा शेख) इंश्‍योरेंस के दो करोड़ रुपये हासिल करने की जल्‍दबाजी में इंश्‍योरेंस एजेंट को फोन करती है। जीवन की मकान मालकिन यशिका (पूजा चोपड़ा) उस पर फिदा है। जीवन के जीवन की परतें खुलती हैं।


उस दौरान योजना के घर में गैंगस्‍टर विनायक (विजय राज) और मन्‍नू (बृजेंद्र काला) जबरन घुस आते हैं। जीवन उनके सामने आ जाता है। वो उससे हीरे के बारे में पूछते हैं। दोनों उसे बार-बार भीमा बुलाते है। यह सुनकर योजना को भी लगता है कि वही भीमा है। मकान मालकिन भी घर में छुपी होती है। यह सारा गड़बड़ झाला और अफरातफरी एक घर में हो रहा है। इस बीच बीमा एजेंट फिर पुलिस भी आती है। आखिर में हीरे कहां हैं? क्‍या वे जीवन और योजना को मिलेंगे कहानी इस संबंध में हैं।



काफी जगह पर ठूंसी हुई लगी कॉमेडी

विवेक वर्मा की लिखी कहानी ‘जीवन या भीमा कॉन?’ (जिसका नाम पहले ‘जीवन भीमा योजना’ था) में हमशक्लों की उलझन, बीमा की बड़ी रकम, गायब हीरे और गैंगस्टर जैसे कई ऐसे मसाले हैं, जो हास्य और रोमांच पैदा करने की पूरी गुंजाइश रखते हैं, लेकिन निर्देशक अभिषेक डोगरा इन संभावनाओं को प्रभावी ढंग से इस्तेमाल नहीं कर पाते। फिल्म में कॉमेडी परिस्थितियों से स्वाभाविक हास्य पैदा करने के बजाय जबरन ठूंसी गई लगती है। कई जगह पर हास्य का स्तर भी फूहड़ता की ओर चला जाता है। मनोरंजक कहानी बनने के बजाए यह बिखरी हुई और थकी-थकी सी महसूस होने लगती है।
मंझे हुए कलाकार भी नहीं बना पाए फिल्म को दिलचस्प

फिल्म में मंझे कलाकार हैं, लेकिन विडंबना यही है कि यह सब कमजोर लेखन से जूझते नजर आते हैं। अरशद वारसी अपने सहज और सधे हुए अंदाज से किरदार को जीवंत बनाए रखते हैं। संजीदा शेख के पास योजना के रूप में एक महत्वपूर्ण किरदार है, लेकिन उनके पात्र को न तो पर्याप्त गहराई मिलती है और न ही ऐसा कोई अवसर, जिससे दर्शक उससे जुड़ाव महसूस करें।




जबकि विजय राज गैंगस्टर के किरदार में कुछ जगहों पर हंसी के पल लाने में कामयाब रहते हैं। बृजेंद्र काला के हिस्से कमजोर लेखन की सबसे ज्यादा मार आती है। जरूरत से ज्यादा ग्लैमरस अंदाज में पेश की गई यशिका के किरदार में पूजा चोपड़ा खास प्रभाव नहीं छोड़ पातीं। कुल मिलाकर ‘जीवन या भीमा कॉन?’ का दिलचस्प विचार कमजोर लेखन और ढीले निर्देशन में उलझकर रह जाता है। संभावनाओं से भरी यह फिल्म अंततः निराश करती है।
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