'ऐ वतन मेरे वतन' से 'भारत एक खोज' तक, सिनेमा में 'करो या मरो' की गूंज, भारत छोड़ो आंदोलन पर बनीं ये फिल्में
'ऐ वतन मेरे वतन' से 'भारत एक खोज' तक, सिनेमा में 'करो या मरो' की गूंज, भारत छोड़ो आंदोलन पर बनीं ये फिल्में
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान की गूंज हिंदी सिनेमा की कई फिल्मों में भी अलग-अलग रूपों में सुनाई दी है। ...और पढ़ें

इन फिल्मों में भारत छोड़ो आंदोलन की गूंज। फोटो क्रेडिट- एक्स
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। 8 अगस्त, 1942 वह ऐतिहासिक दिन था, जब बंबई (अब मुंबई) के ग्वालिया टैंक मैदान, जिसे आज अगस्त क्रांति मैदान कहते हैं, में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया। इसी अवसर पर महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ का आह्वान किया।
नौ अगस्त की सुबह गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद सहित सभी शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को कठोरता से दबा दिया। उस समय यह भले ही ब्रिटिश शासन की तत्काल समाप्ति के अपने घोषित लक्ष्य को हासिल नहीं कर सका, लेकिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर इसका दूरगामी और निर्णायक प्रभाव पड़ा।
आंदोलन के बीच शुरू हुआ था सीक्रेट रोडियो
इस आंदोलन से प्रभावित होकर ही स्वतंत्रता सेनानी ऊषा मेहता ने गुप्त रूप से कांग्रेस रेडियो (Congress Radio) का संचालन किया था। स्वतंत्रता सेनानी ऊषा मेहता के जीवन से प्रेरित फिल्म ‘ऐ वतन मेरे वतन’ (Ae Watan Mere Watan) में भारत छोड़ो आंदोलन को प्रमुखता से दिखाया गया है। इस फिल्म के लेखक और निर्देशक कनन अय्यर बताते हैं कि हम लोग जब फिल्म लिख रहे थे तो ताज्जुब हुआ कि इतने बड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम को सिनेमा में बहुत ज्यादा स्थान नहीं मिला है।

गांधी में भी दिखी आंदोलन की झलक
‘गांधी’ फिल्म में भी भारत छोड़ो आंदोलन का विजुलाइजेशन नहीं हैं। बंबई में बड़ी संख्या में लोग मैदान में आए थे, इसलिए ब्रिटिश शासन डर गया था। लाठी चार्ज, गन फायरिंग, भगदड़ मचना जो उस दिन हुआ हमने दिखाया। उसके समय के फोटोग्राफ काफी उपलब्ध है। इसलिए विश्नसनीयता लाने में दिक्कत नहीं हुई।
साउथ मुंबई में काफी लोकेशन हैं औपनिवेशिक काल की, जो बदली नहीं हैं। हमें सिर्फ वहां शूट करना था, स्पेशल इफेक्ट्स का प्रयोग करके आधुनिक चीजों को मिटाना था। चार-पांच दिन में शूट हुआ है। इसके लिए हमने विशेष रूप से ट्राम बनवाई। यह शहर की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं। वहीं फिल्म गांधी माई फादर में भी गांधी जी द्वारा 'करो या मरो' का नारा देने का दृश्य है।
पर्दे पर गांधी बने जरीवाला ने दोहराया था ऐतिहासिक सीन
फिल्म में महात्मा गांधी की भूमिका निभाने वाले दर्शन जरीवाला कहते हैं कि यह फिल्म गांधी जी और उनके बेटे हरिलाल की कहानी है। उसमें भारत छोड़ो आंदोलन का जिक्र अहम था, जिससे पहले हरिलाल उनसे मिलने आता है। बाद में गांधी 'करो या मरो' का नारा देते हैं। इसी आंदोलन की वजह से गांधी और बा (कस्तूरबा गांधी) को पुणे के आगा खां पैलेस में कैद किया जाता है।
इस सीन के जरिए हमें दिखाना था कि गांधी जी की निजी जिंदगी में चाहे कितना भी परिवार को लेकर संघर्ष हो लेकिन जब देश की बात करते हैं तो कितनी एकाग्रता और निष्ठा से। इसलिए यह सीन बहुत जरूरी था।
श्याम बेनेगल की फिल्म में भी था आंदोलन का जिक्र
वहीं इस पर श्याम बेनेगल निर्देशित फिल्म नेताजी सुभाष चंद्र बोस: द फॉरगॉटन हीरो के एक दृश्य में सिर्फ भारत छोड़ो आंदोलन का जिक्र आता है। इस बारे में इसके लेखक अतुल तिवारी बताते हैं कि हालांकि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से नेताजी सुभाष चंद्र बोस का प्रत्यक्ष संबंध नहीं था, लेकिन इस आंदोलन से वे बेहद उत्साहित थे। उन्होंने महात्मा गांधी को एक पत्र भी लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि बापू, आज हम दोनों पहले से कहीं अधिक एक-दूसरे के करीब हैं।

जवाहर लाल नेहरू की किताब पर बनी टीवी सीरीज
आगे नेहरू की किताब ‘द डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ पर आधारित धारावाहिक भारत एक खोज में दर्शाए बलिया प्रसंग के बारे में बात करते हुए अतुल कहते हैं कि भारत छोड़ो आंदोलन बंबई से शुरू हुआ और उसकी चिंगारियां पूरे देश में फैल गईं। इसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में कई बड़े घटनाक्रम हुए। गांधीजी ने कहा था ‘करेंगे या मरेंगे’, लेकिन लोगों के सामने सवाल था कि आखिर करना क्या है? गांधीजी ने इसका कोई विस्तृत कार्यक्रम नहीं बताया था।
बलिया का विद्रोह
उस समय संचार के साधन भी आज जैसे नहीं थे कि कोई संदेश तुरंत पूरे देश में पहुंच जाए। उस समय भारी बारिश तथा बाढ़ के कारण बलिया जिला लगभग बाकी इलाकों से कट गया था। इसके एक ओर गंगा और दूसरी ओर घाघरा/सरयू नदी बहती है। स्वतंत्रता सेनानी चित्तू पांडे और आंदोलनकारियों ने इस परिस्थिति का फायदा उठाते हुए जिला प्रशासन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया और जेल में बंद कई नेताओं को रिहा करा लिया।
20 अगस्त 1942 को बलिया में स्वतंत्रता की घोषणा कर स्थानीय प्रशासन के लिए पंचायतें गठित की गईं, लेकिन 22–23 अगस्त की रात ब्रिटिश सेना ने दोबारा बलिया पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके बाद पूरे घटनाक्रम की रिपोर्ट लंदन भेजी गई। ब्रिटिश संसद में भी भारत की परिस्थितियों और बलिया में हुई घटनाओं को लेकर सवाल उठे।
ऐतिहासिक घटना ने हिला दी थी ब्रिटिश शासन की नींव
जब ब्रिटिश सरकार से पूछा गया कि भारत में आखिर हो क्या रहा है, तब कहा गया कि बलिया को दोबारा जीत लिया गया है। विपक्ष ने इस शब्द पर सवाल उठाया। क्या हमने भारत के इस हिस्से पर अपना नियंत्रण खो दिया था? यही बात भारत छोड़ो आंदोलन में बलिया की कहानी को खास बनाती है।
इसके अलावा महाराष्ट्र के सतारा जिले में क्रांतिसिंह नाना पाटिल के नेतृत्व में ‘प्रति सरकार’ नामक समानांतर सरकार स्थापित की गई थी। कैप्टन भाऊ (रामचंद्र लाड) और जी. डी. लाड जैसे क्रांतिकारी भी इससे जुड़े थे। इस भूमिगत व्यवस्था ने सतारा और आसपास के क्षेत्रों में ब्रिटिश शासन को कड़ी चुनौती दी। कनन कहते हैं कि ऐसे कई घटनाक्रम इतिहास में दर्ज हैं जिन्हें सिनेमा में दर्शाया जाना बाकी है।
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Mirchmasala
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