झारखंड में बिना रजिस्ट्रेशन नहीं चलेंगे अस्पताल-क्लीनिक, हाईकार्ट ने कानून को सख्ती से लागू करने का दिया आदेश
झारखंड में बिना रजिस्ट्रेशन नहीं चलेंगे अस्पताल-क्लीनिक, हाईकार्ट ने कानून को सख्ती से लागू करने का दिया आदेश
झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य में क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि बिना निबंधन के कोई भी अस्पताल, नर ...और पढ़ें

हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने एकजनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य में क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया है।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि कानून मौजूद होने के बावजूद झारखंड में इसका प्रभावी तरीके से क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य में कोई भी अस्पताल, नर्सिंग होम या क्लीनिक बिना निबंधन के संचालित नहीं होना चाहिए।
हाईकोर्ट ने प्रार्थी रंजीव रंजन की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उक्त निर्णय पारित किया है। अदालत ने राज्य स्तरीय क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट काउंसिल को निर्देश दिया कि राज्य में संचालित सभी अस्पतालों और क्लीनिक का रजिस्टर तैयार कर उसे अद्यतन किया जाए।
साथ ही हर महीने डिजिटल रिटर्न भेजकर राष्ट्रीय रजिस्टर को अपडेट किया जाए और मानकों के क्रियान्वयन पर वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित की जाए।
72 घंटे के अंदर मेडिकल रिपोर्ट मिले
खंडपीठ ने यह भी कहा कि जिला स्तर पर पंजीकरण प्राधिकारियों को सक्रिय किया जाए और अस्पतालों व क्लीनिक का नियमित निरीक्षण सुनिश्चित किया जाए।
अदालत ने राज्य सरकार को यह भी सुझाव दिया कि नियमों के अनुपालन की जांच के लिए विशेषज्ञों की फ्लाइंग स्क्वाड गठित करने पर विचार किया जाए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि अस्पतालों और चिकित्सकों को मरीज या उनके अधिकृत परिजनों को अनुरोध के 72 घंटे के भीतर मेडिकल रिकॉर्ड उपलब्ध कराना अनिवार्य है।
इसके लिए संबंधित अधिकारियों को सभी क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट को इस नियम की जानकारी देने और उसका पालन सुनिश्चित कराने का निर्देश दिया गया है।
4 महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपने के आदेश
खंडपीठ ने स्वास्थ्य सेवा निदेशक को चार महीने के भीतर कार्रवाई की विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। प्रार्थी रंजीव रंजन ने अपने पिता की वर्ष 2017 में एक निजी अस्पताल में हुई मृत्यु के बाद जनहित याचिका दाखिल की थी।
अदालत ने व्यक्तिगत लापरवाही के आरोपों की जांच से इन्कार करते हुए कहा कि इस तरह के विवाद सक्षम प्राधिकार के यहां उठाए जा सकते हैं।
झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य में क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि बिना निबंधन के कोई भी अस्पताल, नर ...और पढ़ें

हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने एकजनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य में क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया है।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि कानून मौजूद होने के बावजूद झारखंड में इसका प्रभावी तरीके से क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य में कोई भी अस्पताल, नर्सिंग होम या क्लीनिक बिना निबंधन के संचालित नहीं होना चाहिए।
हाईकोर्ट ने प्रार्थी रंजीव रंजन की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उक्त निर्णय पारित किया है। अदालत ने राज्य स्तरीय क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट काउंसिल को निर्देश दिया कि राज्य में संचालित सभी अस्पतालों और क्लीनिक का रजिस्टर तैयार कर उसे अद्यतन किया जाए।
साथ ही हर महीने डिजिटल रिटर्न भेजकर राष्ट्रीय रजिस्टर को अपडेट किया जाए और मानकों के क्रियान्वयन पर वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित की जाए।
72 घंटे के अंदर मेडिकल रिपोर्ट मिले
खंडपीठ ने यह भी कहा कि जिला स्तर पर पंजीकरण प्राधिकारियों को सक्रिय किया जाए और अस्पतालों व क्लीनिक का नियमित निरीक्षण सुनिश्चित किया जाए।
अदालत ने राज्य सरकार को यह भी सुझाव दिया कि नियमों के अनुपालन की जांच के लिए विशेषज्ञों की फ्लाइंग स्क्वाड गठित करने पर विचार किया जाए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि अस्पतालों और चिकित्सकों को मरीज या उनके अधिकृत परिजनों को अनुरोध के 72 घंटे के भीतर मेडिकल रिकॉर्ड उपलब्ध कराना अनिवार्य है।
इसके लिए संबंधित अधिकारियों को सभी क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट को इस नियम की जानकारी देने और उसका पालन सुनिश्चित कराने का निर्देश दिया गया है।
4 महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपने के आदेश
खंडपीठ ने स्वास्थ्य सेवा निदेशक को चार महीने के भीतर कार्रवाई की विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। प्रार्थी रंजीव रंजन ने अपने पिता की वर्ष 2017 में एक निजी अस्पताल में हुई मृत्यु के बाद जनहित याचिका दाखिल की थी।
अदालत ने व्यक्तिगत लापरवाही के आरोपों की जांच से इन्कार करते हुए कहा कि इस तरह के विवाद सक्षम प्राधिकार के यहां उठाए जा सकते हैं।
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