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झारखंड में घरों की एक्सपायर दवाओं से लेकर अस्पतालों के मेडिकल कचरे तक, कैसे बढ़ रहा AMR का खतरा?

झारखंड में घरों की एक्सपायर दवाओं से लेकर अस्पतालों के मेडिकल कचरे तक, कैसे बढ़ रहा AMR का खतरा?


एंटीबायोटिक दवाओं के अंधाधुंध उपयोग के साथ-साथ मेडिकल कचरे का गलत निस्तारण एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) का बड़ा कारण बन रहा है। घरों में एक्सपाय ...और पढ़ें






घरों में एक्सपायर एंटीबायोटिक्स एएमआर को बढ़ावा दे रही हैं।


रिम्स जैसे अस्पतालों में मेडिकल कचरा निस्तारण में खामियां।


सामान्य कचरे में मेडिकल वेस्ट मिलने से संक्रमण का खतरा।


रांची। एंटीबायोटिक दवाओं के अंधाधुंध इस्तेमाल को अक्सर एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) की मुख्य वजह माना जाता है, लेकिन इसके पीछे एक और बड़ा, कम दिखने वाला खतरा तेजी से उभर रहा है मेडिकल कचरे का गलत निस्तारण।

घरों में बची या एक्सपायर हो चुकी एंटीबायोटिक्स, अस्पतालों से निकलने वाला मेडिकल वेस्ट और दवा फैक्ट्रियों से बिना शोधित बहता दवामिश्रित पानी एएमआर को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार यह कचरा मिट्टी, पानी और हवा के जरिए इंसानी शरीर तक पहुंचता है। परिणामस्वरूप बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बनते जाते हैं और सामान्य संक्रमण भी जानलेवा साबित होने लगते हैं।
घरों में एक्सपायर एंटीबायोटिक्स: अनदेखा जोखिम

शहर के अधिकांश घरों में पुरानी और एक्सपायर दवाएं सालों तक रखी रहती हैं। जरूरत न होने पर इन्हें कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है या नालियों में बहा दिया जाता है। इससे एंटीबायोटिक के अंश पानी और मिट्टी में मिल जाते हैं।


यही अंश बैक्टीरिया को दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बनने का प्रशिक्षण देते हैं। रिम्स के सेवानिवृत्त चिकित्सक डा. बी कुमार कहते हैं कि लोग सोचते हैं कि एक-दो गोली फेंक देने से क्या फर्क पड़ेगा, लेकिन यही छोटी-छोटी लापरवाहियां एएमआर को जन्म देती हैं।
एंटीबायोटिक का अंश जब लंबे समय तक पर्यावरण में रहता है, तो बैक्टीरिया धीरे-धीरे उसे झेलना सीख लेते हैं।
अस्पतालों में मेडिकल वेस्ट निस्तारण की हकीकत

सरकारी और निजी अस्पतालों में मेडिकल वेस्ट निस्तारण के लिए नियम और एसओपी तो बने हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति चिंताजनक है। सरकारी अस्पतालों में कचरा निस्तारण नीति पूरी तरह मजबूत नहीं हो पाई है। कई जगहों पर इस्तेमाल की गई सिरिंज, पट्टियां, दवाओं की शीशियां और अन्य जैव-चिकित्सीय कचरा खुले में पड़ा रहता है।

रांची स्थित रिम्स में मेडिकल वेस्ट निस्तारण की व्यवस्था मौजूद है, लेकिन कार्यप्रणाली में खामियों के कारण समस्या बनी हुई है। अस्पताल परिसर के पीछे बनाए गए कचरा स्टोरेज में मेडिकल कचरा बिखरा पड़ा रहता है। कई बार कचरे को वहीं जलाया जाता है या आसपास फेंक दिया जाता है।


हाथ से कचरा उठाकर निस्तारण के लिए ले जाने की प्रक्रिया में भी पूर्ण स्वच्छता और सुरक्षा का पालन नहीं हो पाता। इससे आसपास के इलाकों में रहने वाले लोग और हास्टल में रह रहे छात्र-छात्राएं दुर्गंध और प्रदूषण से परेशान हैं।


विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके तात्कालिक दुष्प्रभाव भले स्पष्ट न दिखें, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।
सामान्य कचरे में मिल रहा मेडिकल वेस्ट

स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब मेडिकल वेस्ट सामान्य कचरे में मिल जाता है। रिम्स परिसर में कई जगह सामान्य कचरे के ढेर में भी मेडिकल वेस्ट मिला पाया जाता है। कचरा समय पर नहीं उठता और बड़े डस्टबीन के आसपास साफ-सफाई का अभाव रहता है।


इससे न केवल संक्रमण का खतरा बढ़ता है, बल्कि एएमआर की प्रक्रिया भी तेज होती है। डाक्टर बताते हैं कि जब मेडिकल वेस्ट सामान्य कचरे में मिल जाता है, तो उसमें मौजूद बैक्टीरिया खुले वातावरण में फैलते हैं।

हवा, मक्खी और पानी के जरिए ये बैक्टीरिया इंसानों तक पहुंचते हैं और धीरे-धीरे दवाओं पर असर कम होने लगता है। यही एएमआर की सबसे खतरनाक कड़ी है।
एएमआर पर सीधा असर

विशेषज्ञों के अनुसार मेडिकल कचरे से फैलने वाला एएमआर आने वाले वर्षों में बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन सकता है। ऐसी स्थिति में सामान्य संक्रमण के इलाज में भी महंगी और सीमित दवाओं का सहारा लेना पड़ेगा।


डॉक्टर बताते हैं कि एएमआर कोई भविष्य की समस्या नहीं, बल्कि वर्तमान का संकट है। अगर मेडिकल वेस्ट और एक्सपायर एंटीबायोटिक्स के निस्तारण पर अभी सख्ती नहीं की गई, तो आने वाली पीढ़ी के लिए साधारण इलाज भी मुश्किल हो जाएगा।
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