दिमाग पर जोर नहीं, कॉमेडी पर कंट्रोल नहीं... वीर दास की 'हैप्पी पटेल' देखने लायक है?
दिमाग पर जोर नहीं, कॉमेडी पर कंट्रोल नहीं... वीर दास की 'हैप्पी पटेल' देखने लायक है?
Happy Patel Movie Review: आमिर खान प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी हैप्पी पटेल में वीर दास ने मुख्य भूमिका निभाई है, साथ ही फिल्म का निर्देशन भी किया है। य ...और पढ़ें

हैप्पी पटेल का रिव्यू। फोटो क्रेडिट- इंस्टाग्राम
आमिर खान ने किया है हैप्पी पटेल का निर्माण
वीर दास की हैप्पी पटेल में आमिर का कैमियो
दो फिल्मों का निचोड़ है वीर दास की हैप्पी पटेल
फिल्म रिव्यू- हैप्पी पटेल: खतरनाक जासूस
प्रमुख कलाकार- वीर दास, मिथिला पार्कर, मोना सिंह, शारिब हाशमी, आमिर खान, इमरान खान
निर्देशक- वीर दास और कवि शास्त्री
अवधि- दो घंटा एक मिनट
स्टार- दो
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। फिल्म हैप्पी पटेल : खतरनाक जासूस (Happy Patel: Khatarnak Jasoos) से स्टैंडअप, कॉमेडियन और अभिनेता वीर दास (Vir Das) ने निर्देशन में भी कदम रखा है। उन्होंने कहा था, अगर मौका मिला तो काफी पागलपन भरी फिल्म बनाएंगे।
करीब दस साल पहले उन्होंने सोचा था कि जासूसी एक्शन कॉमेडी फिल्म जॉनी इंग्लिश (Johnny English) और तीस मार खां (Tees Maar Khan) को मिला दिया जाए तो किस तरह की फिल्म बनेगी। परिणाम सामने है। तीस मार खां की आलोचनाओं से सभी वाकिफ हैं। इसका हाल भी वैसा ही दिखता है।
टिपिकल जासूस फिल्मों से इतर यह फिल्म बेवकूफियों, डबल मीनिंग डायलॉग्स, टूटी-फूटी हिंदी से कॉमेडी और बालीवुड के गानों जैसे मसालों का इस्तेमाल कर बनाई गई है। फिल्म बेतुकी बातों और बे-सिर-पैर की परिस्थितियों से भरी हुई है।
क्या है हैप्पी पटेल की कहानी?
गोवा में सेट कहानी का आरंभ साल 1991 में डॉन जिम्मी मारियो (आमिर खान) और दो बिटिश जासूस के बीच लड़ाई से होता है। इसमें जिम्मी मारा जाता है। ब्रिटिश जासूस की नौकरानी भी गोली लगने से मारी जाती है। उसके बेटे को दोनों जासूस पालते हैं। वहां से कहानी वर्तमान में आती है। खाना बनाने और डांसर में पारंगत हैप्पी (वीर दास) भी अपने पिताओं की तरह जासूस बनना चाहता है।

उसे पता चलता है कि उसकी मां भारतीय थी। उधर, गोवा की डॉन जिम्मी की बेटी मामा (मोना सिंह) बन चुकी है। वह हैप्पी (वीर दास) की खोज में है। दरअसल 34 वर्षीय हैप्पी के पालनक पिताओं ने ही जिम्मी को मारा होता है। आखिरकार एक नाटकीय घटनाक्रम में हैप्पी को बिटिश जासूसी एजेंसी गोरेपन की क्रीम बना रही बीट्रिस फाफरबाम (माया रेशेल मकमैनस) की खोज में भेजती है जो भारत में लापता है।
हैप्पी को भारतीय तौर तरीकों के साथ विशेष ट्रेनिंग दी जाती है। जिसमें मोलभाव करना, शाह रुख खान का बाहं फैलाकर लड़कियों को प्रभावित करना जैसी चीजें भी शामिल होती हैं। बीट्रिस दरअसल, मामा की कैद में होती है। मामा भी मशहूर शेफ संजीव कपूर की रेस्पिी की मुरीद होती है।

वह अपने गुर्गों को सजा देने के लिए अपने बनाए स्पेशल कटलेट खिलाती है। खैर, हैप्पी गोवा आता है। वहां पर उसकी मुलाकात गीत (शारिब हाशमी) से होती है जो मिशन में उसकी मदद करता है। इस दौरान डांसर रूपा (मिथिला पार्कर) को अपना दिल दे बैठता है। मामा से उसका सामना होता है। फिर वह उसे कैसे छुड़ाता है? मामा उससे बदला ले पाती है या नहीं कहानी इस संबंध में हैं।
चार भूमिकाओं के बाद भी रोमांच नहीं ला पाए वीर दास
वीर ने अभिनय के अलावा फिल्म में कई और भूमिकाएं भी निभाई हैं। उन्होंने कवि शास्त्री के साथ फिल्म का निर्देशन और अमोग रण्रदीवे के साथ मिलकर फिल्म की कहानी भी लिखी है। यही नहीं गीतकारों में भी उनका नाम शामिल है। कहानी साधारण है लेकिन जिन बेवकूफियों की भरमार के साथ कहानी आगे बढ़ती है, उसमें कोई रोमांच नहीं है।
कहां फिसल गई फिल्म?
आप कहानी या पात्र के साथ जुड़ाव महसूस नहीं करते हैं। लिंग और गाली-गलौज को रोजमर्रा की चीजों से गड़मड़ करने वाली पंक्तियों पर शुरू में जो हल्के फुल्के क्षण आते हैं वह जल्द ही खत्म हो जाते हैं। हैप्पी की भाषा पर पकड़ उसकी जासूसी काबिलियत जितनी ही कमजोर बनी रहती है। शुरुआत में स्थापित कर दिया गया है कि आपको अपने दिमाग पर जोर देने की जरूरत नहीं है।
हैप्पी पटेल में कॉमेडी का नहीं चला जादू!
स्टैंडअप कॉमेडी के हृयूमर से फिल्म को बनाने की कोशिश साफ दिखती है। इसमें टूटी फूटी हिंदी के साथ डबल मीनिंग डायलॉग्स से कॉमेडी पैदा करने की कोशिश नाकाम दिखती है। दुनिया बदल देने वाले मिशनों पर निकले जासूसों वाली फिल्मों, अपनी मातृभूमि दोबारा खोजने वाले एनआरआई, गोरे रंग के प्रति भारतीय जुनून और शाह रुख खान की बाहें फैलाने वाली अदा का मजाक उड़ाने के बावजूद बांध नहीं पाती।

फिल्म के कलाकारों का प्रदर्शन
वीर दास पूरी फिल्म में छाए रहते हैं। अपनी मासूमियत से अराजक माहौल को बनाए रखने में कामयाब रहते हैं, लेकिन कॉमेडी के स्तर पर फिल्म तीखा व्यंग्य करने में नाकाम रहती है। मिथिला पार्कर के साथ उनकी केमिस्ट्री भी दिलचस्प नहीं बन पाई है।
हालांकि, मिथिला को यहां पर डांस के साथ एक्शन करने का मौका मिला है। उसमें वह अच्छी भी लगी हैं। गीत की भूमिका में शारिब का काम सराहनीय है। वह फिल्म लाल सिंह चड्ढा में निभाए आमिर खान के पात्र की याद ताजा करते हैं। मामा की भूमिका में मोना सिंह को अपने अभिनय का नया पहलू दिखाने का मौका मिला है, लेकिन उनका पात्र दमदार नहीं बन पाया है।
इस फिल्म में हैप्पी करने के मसाले पुराने और घिसे पिटे हैं। वह कहीं से हैप्पी नहीं करते।
Happy Patel Movie Review: आमिर खान प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी हैप्पी पटेल में वीर दास ने मुख्य भूमिका निभाई है, साथ ही फिल्म का निर्देशन भी किया है। य ...और पढ़ें

हैप्पी पटेल का रिव्यू। फोटो क्रेडिट- इंस्टाग्राम
आमिर खान ने किया है हैप्पी पटेल का निर्माण
वीर दास की हैप्पी पटेल में आमिर का कैमियो
दो फिल्मों का निचोड़ है वीर दास की हैप्पी पटेल
फिल्म रिव्यू- हैप्पी पटेल: खतरनाक जासूस
प्रमुख कलाकार- वीर दास, मिथिला पार्कर, मोना सिंह, शारिब हाशमी, आमिर खान, इमरान खान
निर्देशक- वीर दास और कवि शास्त्री
अवधि- दो घंटा एक मिनट
स्टार- दो
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। फिल्म हैप्पी पटेल : खतरनाक जासूस (Happy Patel: Khatarnak Jasoos) से स्टैंडअप, कॉमेडियन और अभिनेता वीर दास (Vir Das) ने निर्देशन में भी कदम रखा है। उन्होंने कहा था, अगर मौका मिला तो काफी पागलपन भरी फिल्म बनाएंगे।
करीब दस साल पहले उन्होंने सोचा था कि जासूसी एक्शन कॉमेडी फिल्म जॉनी इंग्लिश (Johnny English) और तीस मार खां (Tees Maar Khan) को मिला दिया जाए तो किस तरह की फिल्म बनेगी। परिणाम सामने है। तीस मार खां की आलोचनाओं से सभी वाकिफ हैं। इसका हाल भी वैसा ही दिखता है।
टिपिकल जासूस फिल्मों से इतर यह फिल्म बेवकूफियों, डबल मीनिंग डायलॉग्स, टूटी-फूटी हिंदी से कॉमेडी और बालीवुड के गानों जैसे मसालों का इस्तेमाल कर बनाई गई है। फिल्म बेतुकी बातों और बे-सिर-पैर की परिस्थितियों से भरी हुई है।
क्या है हैप्पी पटेल की कहानी?
गोवा में सेट कहानी का आरंभ साल 1991 में डॉन जिम्मी मारियो (आमिर खान) और दो बिटिश जासूस के बीच लड़ाई से होता है। इसमें जिम्मी मारा जाता है। ब्रिटिश जासूस की नौकरानी भी गोली लगने से मारी जाती है। उसके बेटे को दोनों जासूस पालते हैं। वहां से कहानी वर्तमान में आती है। खाना बनाने और डांसर में पारंगत हैप्पी (वीर दास) भी अपने पिताओं की तरह जासूस बनना चाहता है।
उसे पता चलता है कि उसकी मां भारतीय थी। उधर, गोवा की डॉन जिम्मी की बेटी मामा (मोना सिंह) बन चुकी है। वह हैप्पी (वीर दास) की खोज में है। दरअसल 34 वर्षीय हैप्पी के पालनक पिताओं ने ही जिम्मी को मारा होता है। आखिरकार एक नाटकीय घटनाक्रम में हैप्पी को बिटिश जासूसी एजेंसी गोरेपन की क्रीम बना रही बीट्रिस फाफरबाम (माया रेशेल मकमैनस) की खोज में भेजती है जो भारत में लापता है।
हैप्पी को भारतीय तौर तरीकों के साथ विशेष ट्रेनिंग दी जाती है। जिसमें मोलभाव करना, शाह रुख खान का बाहं फैलाकर लड़कियों को प्रभावित करना जैसी चीजें भी शामिल होती हैं। बीट्रिस दरअसल, मामा की कैद में होती है। मामा भी मशहूर शेफ संजीव कपूर की रेस्पिी की मुरीद होती है।
वह अपने गुर्गों को सजा देने के लिए अपने बनाए स्पेशल कटलेट खिलाती है। खैर, हैप्पी गोवा आता है। वहां पर उसकी मुलाकात गीत (शारिब हाशमी) से होती है जो मिशन में उसकी मदद करता है। इस दौरान डांसर रूपा (मिथिला पार्कर) को अपना दिल दे बैठता है। मामा से उसका सामना होता है। फिर वह उसे कैसे छुड़ाता है? मामा उससे बदला ले पाती है या नहीं कहानी इस संबंध में हैं।
चार भूमिकाओं के बाद भी रोमांच नहीं ला पाए वीर दास
वीर ने अभिनय के अलावा फिल्म में कई और भूमिकाएं भी निभाई हैं। उन्होंने कवि शास्त्री के साथ फिल्म का निर्देशन और अमोग रण्रदीवे के साथ मिलकर फिल्म की कहानी भी लिखी है। यही नहीं गीतकारों में भी उनका नाम शामिल है। कहानी साधारण है लेकिन जिन बेवकूफियों की भरमार के साथ कहानी आगे बढ़ती है, उसमें कोई रोमांच नहीं है।
कहां फिसल गई फिल्म?
आप कहानी या पात्र के साथ जुड़ाव महसूस नहीं करते हैं। लिंग और गाली-गलौज को रोजमर्रा की चीजों से गड़मड़ करने वाली पंक्तियों पर शुरू में जो हल्के फुल्के क्षण आते हैं वह जल्द ही खत्म हो जाते हैं। हैप्पी की भाषा पर पकड़ उसकी जासूसी काबिलियत जितनी ही कमजोर बनी रहती है। शुरुआत में स्थापित कर दिया गया है कि आपको अपने दिमाग पर जोर देने की जरूरत नहीं है।
हैप्पी पटेल में कॉमेडी का नहीं चला जादू!
स्टैंडअप कॉमेडी के हृयूमर से फिल्म को बनाने की कोशिश साफ दिखती है। इसमें टूटी फूटी हिंदी के साथ डबल मीनिंग डायलॉग्स से कॉमेडी पैदा करने की कोशिश नाकाम दिखती है। दुनिया बदल देने वाले मिशनों पर निकले जासूसों वाली फिल्मों, अपनी मातृभूमि दोबारा खोजने वाले एनआरआई, गोरे रंग के प्रति भारतीय जुनून और शाह रुख खान की बाहें फैलाने वाली अदा का मजाक उड़ाने के बावजूद बांध नहीं पाती।
फिल्म के कलाकारों का प्रदर्शन
वीर दास पूरी फिल्म में छाए रहते हैं। अपनी मासूमियत से अराजक माहौल को बनाए रखने में कामयाब रहते हैं, लेकिन कॉमेडी के स्तर पर फिल्म तीखा व्यंग्य करने में नाकाम रहती है। मिथिला पार्कर के साथ उनकी केमिस्ट्री भी दिलचस्प नहीं बन पाई है।
हालांकि, मिथिला को यहां पर डांस के साथ एक्शन करने का मौका मिला है। उसमें वह अच्छी भी लगी हैं। गीत की भूमिका में शारिब का काम सराहनीय है। वह फिल्म लाल सिंह चड्ढा में निभाए आमिर खान के पात्र की याद ताजा करते हैं। मामा की भूमिका में मोना सिंह को अपने अभिनय का नया पहलू दिखाने का मौका मिला है, लेकिन उनका पात्र दमदार नहीं बन पाया है।
इस फिल्म में हैप्पी करने के मसाले पुराने और घिसे पिटे हैं। वह कहीं से हैप्पी नहीं करते।
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