केवल पेड़ों की क्षति का आकलन करता है उत्तराखंड वन विभाग, जीवों की क्षति का कोई ध्यान नहीं

Forest Fire उत्तराखंड में हर साल बड़े पैमाने पर वन संपदा आग की भेंट चढ़ रही है। हैरत की बात ये है कि वन विभाग छोटे-बड़े पेड़ों की क्षति का तो आकलन करता है लेकिन पारिस्थितिकी तंत्र में योगदान देने वाले जीवों की क्षति आंकलित ही नहीं की जाती।
Forest Fire in Uttarakhand: पर्यावरण संरक्षण में उत्तराखंड महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हर साल तीन लाख करोड़ रुपये से अधिक की पर्यावरणीय सेवाएं यह राज्य दे रहा है। इसमें अकेले वनों की भागीदारी एक लाख करोड़ की है।
यद्यपि, वनों के संरक्षण की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं है। जंगल की आग एक बड़ी चुनौती के रूप में है। आग से पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं के साथ ही पारिस्थितिकी तंत्र को क्षति पहुंच रही है। इससे जुड़े विविध पहलुओं को सामने रखते हुए यह श्रृंखला प्रारंभ की जा रही है।
बड़े पैमाने पर वन संपदा आग की भेंट चढ़ रही
उत्तराखंड में हर साल बड़े पैमाने पर वन संपदा आग की भेंट चढ़ रही है। वर्ष 2016 से अब तक के आंकड़ों को देखें तो हर वर्ष जंगलों में आग की औसतन 1553 घटनाएं हो रही है, जिनमें 2605 हेक्टेयर वन क्षेत्र झुलस रहा है।
हैरत की बात ये है कि वन विभाग छोटे-बड़े पेड़ों की क्षति का तो आकलन करता है, लेकिन पारिस्थितिकी तंत्र में योगदान देने वाले जीवों की क्षति आंकलित ही नहीं की जाती। साथ ही जल स्रोतों को कितना नुकसान आग से पहुंचता है, इसका ब्योरा भी नहीं जुटाया जाता। यद्यपि, पूर्व में इसे लेकर मंथन भी हुआ, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ पाई।
किसी भी मौसम में सुलग जा रहे जंगलअमूमन जंगलों में आग की घटनाएं फरवरी मध्य से मानसून आने तक की अवधि में अधिक होती है। इसीलिए इस समयावधि को संवेदनशील मानते हुए इसे फायर सीजन कहा जाता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह धारणा टूटी है। अब जंगल किसी भी मौसम में सुलग जा रहे हैं।
पिछले वर्ष भी नवंबर व दिसंबर में कुछ स्थानों पर वनों में आग की घटनाएं सामने आई थीं। इसके पीछे के कारणों को लेकर विभाग मंथन में जुटा है, लेकिन यह भी सही है कि क्षति का सरसरी तौर पर ही सतही आकलन हो रहा है।
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