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6 मुद्दों पर परखा गया नोटबंदी का फैसला, जानिए जस्टिस नागरत्ना और बाकी जजों की क्या रही राय

6 मुद्दों पर परखा गया नोटबंदी का फैसला, जानिए जस्टिस नागरत्ना और बाकी जजों की क्या रही राय
सप्रीमकोर्ट ने केंद्र सरकार के खिलाफ दायर सभी 58 याचिकाओं को खारिज किया है. कोर्ट ने यह भी तर्क दिया है कि फैसले में कोई गड़बड़ी नजर नहीं आती. हालांकि बेंच में शामिल अकेली महिला जज बीवी नागरत्ना ने नोटबंदी की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं.


नोटबंदी पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के पक्ष में फैसला दिया है.

नोटबंदी की प्रक्रिया पर लगातार उठ रहे सवालों पर सोमवार सुप्रीम कोर्ट ने विराम लगा दिया. भ्रष्टाचार और कालेधन पर रोक लगाने के लिए किए गए इस निर्णय की प्रक्रिया को शीर्ष अदालत ने सही ठहराया है. वरिष्ठ पत्रकार अशोक बगाड़िया के मुताबिक कोर्ट ने फैसले को सही ठहराने से पहले इस पूरी प्रक्रिया को छह बिंदुओं पर परखा था. इसी आधार पर कोर्ट ने केंद्र सरकार के खिलाफ दायर सभी 58 याचिकाओं को खारिज किया है. कोर्ट ने यह भी तर्क दिया है कि फैसले में कोई गड़बड़ी नजर नहीं आती. हालांकि बेंच में शामिल अकेली महिला जज बीवी नागरत्ना ने नोटबंदी की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने इसे गैरकानूनी करार दिया है. सुप्रीम कोर्ट की बेंच की ओर से फैसला जस्टिस गवई ने सुनाया. जस्टिस नागारत्ना ने अपना तर्क रखा. आइए जानते हैं कि आखिर यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने किस आधार पर परखा.


1- क्या भारत सरकार के पास सभी सीरीज के नोट बंद करने की शक्ति है?

जस्टिस गवई – संविधान और RBI एक्ट केंद्र सरकार को नोटबंदी का अधिकार देता है. अब तक दो बार नोटबंदी के अधिकार का इस्तेमाल हुआ था, 2016 में सरकार ने तीसरी बार इस अधिकार का इस्तेमाल किया था. आरबीआई अकेले ये फैसला नहीं ले सकता.

जस्टिस नागरत्ना – नोटबंदी करने से पहले संसद में चर्चा होनी चाहिए थी, यह फैसला भारत की जनता और अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डालने वाला है, इसलिए सिर्फ नोटिफिकेशन जारी कर इसे नहीं किया जा सकता. इस पर अध्यादेश लाना चाहिए था.
2- धारा 26 (2) का पालन हुआ? नोटबंदी की प्रक्रिया कानूनी रूप से वैध है या नहीं

जस्टिस गवई : आरबीआई एक्ट की धारा 26(2) केंद्र सरकार को ये अधिकार देती है कि वो किसी भी सीरीज के नोट को डिमोनेटाइज कर सकती है.

जस्टिस नागरत्ना : भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 26(2) के अंतर्गत केंद्र सरकार को नोटों की किसी सीरीज को बंद करने का अधिकार है, अधिनियम में ‘कोई भी श्रृंखला’ लिखा है जिसका अर्थ “सभी श्रृंखला” नहीं हो सकता.
3- क्या नोटबंदी से पहले संसद में कानून लाया जाना जरूरी था?

जस्टिस गवई : किसी भी फैसले को इसलिए गलत नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि वो सरकार ने लिया है. नोटबंदी से पहले सरकार और आरबीआई के बीच लगातार छह माह तक बातचीत हुई थी.

जस्टिस नागरत्ना : रिजर्व बैंक की राय को किसी भी तरह सिफारिश नहीं माना जा सकता. संसद में इस पर चर्चा होनी चाहिए थी, चूंकि कानूनी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई, इसीलिए ये गैरकानूनी था.
4- पुराने नोट बदलने के लिए दिया गया समय पर्याप्त था या नहीं?

जस्टिस गवई : सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुनाते हुए जस्टिस गवई ने कहा कि ये किसी भी तरह से नहीं कहा जा सकता है कि पुराने नोट बदलने के लिए 52 दिन सही नहीं थे.

जस्टिस नागरत्ना : उन्होंने इस पर कोई टिप्पणी नहीं दी.
5- क्या नोटबंदी के मामलों में आरबीआई के पास इंडीपेंडेंट पावर है या नहीं ?

जस्टिस गवई : नोटबंदी की प्रक्रिया सही थी. सरकार और आरबीआई ने विचार विमर्श के बाद इस पर फैसला किया है.

जस्टिस नागरत्ना : गंभीर आर्थिक प्रभाव वाले इस फैसले को विशेषज्ञ समिति के समक्ष रखा जाना चाहिए था, संसद में चर्चा होनी थी. RBI ने स्वतंत्र रूप से इस पर फैसला नहीं किया. इस मामले में सिर्फ रिजर्व बैंक से राय मांगी गई थी.
6- नोटबंदी का प्रस्ताव किसकी तरफ से आना चाहिए था?

जस्टिस गवई : हमें इसमें नहीं जाना चाहिए कि प्रस्ताव किसकी तरफ से आया, क्योंकि सरकार या संसद के पास करेंसी को रेगुलेट करने का पावर है. इसलिए प्रस्ताव सरकार भी दे सकती है.
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