64 साल पुरानी Guru Dutt की फिल्म का सामने आया सच, क्या सिर्फ सम्मान देने के लिए अबरार अल्वी को मिला था क्रेडिट?
64 साल पुरानी Guru Dutt की फिल्म का सामने आया सच, क्या सिर्फ सम्मान देने के लिए अबरार अल्वी को मिला था क्रेडिट?
भारत के दिग्गज फिल्ममेकर और राइटर अबरार अल्वी (Abrar Alvi) ने इंडियन सिनेमा को कई बेहतरीन फिल्में दीं। उनके जन्म शताब्दी वर्ष पर पढ़ें उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें...

अबरार अल्वी के जन्म शताब्दी वर्ष पर जानें दिलचस्प बातें
HIGHLIGHTS
अबरार अल्वी के जन्म शताब्दी वर्ष पर जानें दिलचस्प बातें
गुरुदत्त ने अबरार साहब को दी थी निर्देशन की कमान
अबरार अल्वी ने भारतीय सिनेमा को दी बेहतरीन फिल्में
राहुल रवेल, मुंबई। प्यासा, कागज के फूल सहित कई क्लासिक फिल्में देने वाले लेखक अबरार अल्वी किरदारों के नामों से लेकर संवादों को कहानी में पिरोने में माहिर थे। माना जाता है कि साहब बीवी और गुलाम गुरु दत्त की फिल्म थी। फिर क्या वजह थी कि गुरु दत्त ने अबरार साहब को सौंप दी उसके निर्देशन की कमान? अबरार अल्वी के जन्म शताब्दी वर्ष में उनकी कला और व्यक्तित्व के विभिन्न पहलु...
अबरार साहब (Abrar Alvi) का लेखन शानदार था। उन्होंने पापा (फिल्मकार एच.एस. रवेल) के साथ संघर्ष (1968) और लैला मजनू (1976) समेत कई फिल्मों में काम किया था। अबरार साहब ने मुझे बचपन से देखा था। मेरे लिए वो अबरार अंकल थे, लेकिन जब मैंने उनके साथ प्रोफेशनल तौर पर काम करना शुरू किया तो वो मेरे लिए अबरार साहब हो गए।
जब कॉमेडी फिल्म के लिए अबरार साहब से हुई मुलाकात
मैंने उनके साथ बतौर फिल्मकार फिल्म बीवी ओ बीवी में काम किया था। ये कॉमेडी फिल्म थी, मुझे लगा कि इस जॉनर में लेखन के लिए उनसे बेहतर कोई नहीं हो सकता। मैंने उन्हें फिल्म की कहानी सुनाई। अबरार साहब ने कहा कि उन्हें सोचने के लिए एक हफ्ते का समय चाहिए। इतना समय बीतने पर मैंने उन्हें कॉल किया तो उन्होंने कहा कि किरदारों के नाम सोचने के लिए अभी चार-पांच दिन और लगेंगे।
बहरहाल पांच दिन बाद उन्होंने मुझे मुलाकात के लिए मुंबई में जानकी कुटीर स्थित अपने घर बुलाया। उन्होंने नायक चंद्रमोहन सहित अन्य किरदारों के नाम बताए। तब मैंने उनसे कहा कि आपने केवल नाम सोचने के लिए दस दिन ले लिए। इस पर वह बोले कि फिल्म विवाह के लिए किरदारों के कुंडली मिलान पर आधारित है।
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नाम का राशि से भी संबंध होता है। उसी के अनुरूप अन्य पात्रों के नाम मैंने सोचे हैं। मांगलिक नायक चंद्रमोहन की कुंडली
नायिका से किस तरह मिलेगी व किरदारों के बीच बातचीत से कैसी मजाकिया परिस्थितियां बनेंगी, ये सब भी मैंने सोच रखा है।
तब लगा कि अबरार साहब लेखन के स्तर पर कितना दूरगामी सोच रखते थे। फिल्म का काम आगे बढ़ा। सुबह 10-11 बजे जब मैं और रणधीर कपूर उनके घर पहुंचते थे तो वो सोए रहते थे। हमारे जगाने पर वह उठते थे। सबसे पहले वह अपना पुराना पेमेंट चेक करते थे कि वो मिला है कि नहीं, इसके बाद बात आगे बढ़ती। हम लोग भी मुस्कुरा दिया करते।
गुरुदत्त ने अबरार साहब को दी थी निर्देशन की कमान
साहब बीवी और गुलाम (Saheb Biwi Aur Ghulam) फिल्म से बतौर निर्देशक अबरार साहब का नाम जुड़ा था। हालांकि फिल्म को देखकर लोग यही मानते थे कि वो गुरु दत्त साहब (Guru Dutt) की फिल्म थी। उन्होंने फिल्म में बतौर निर्देशक अबरार साहब का नाम देकर उन्हें सम्मान दिया था। इस फिल्म के लिए अबरार साहब को बेस्ट डायरेक्टर का फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला था, जो उनके घर पर शोकेस में सजा था।
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अबरार साहब ने सामने रख दी थी बेस्ट डायरेक्शन की ट्रॉफी
एक दिन मेरी और अबरार साहब के बीच बहस हो गई। सामान्य तौर पर निर्देशक और लेखक के बीच ऐसी बहस होती ही है। अबरार साहब मुझसे बोले कि मेरी बात तुम्हें माननी चाहिए, मैंने तुम्हें बचपन से देखा, मैंने भी जवाब दिया इससे क्या फर्क पड़ता है। मैंने कहा कि अबरार साहब आपने डायलॉग सही नहीं लिखे, मैं शूट कैसे करूंगा।
इस पर अबरार साहब बोले कि कुछ देर रुको। वह सीढ़ी पर चढ़े और शेल्फ से फिल्म फेयर की वह ट्रॉफी उठाकर लाए और हमारे सामने रख दी। फिर बोले कि तुम निर्देशन का जो काम कर रहे हो, उसकी तारीफ का ये तमगा मेरे पास भी है। डब्बू साहब मुस्कुराए और बोले अबरार साहब बहुत दिन आपने ये ट्रॉफी अपने पास रख ली अब तो गुरु दत्त के ऑफिस
भेज दीजिए।
नौकरानी से अबरार साहब ने की थी शादी
अबरार साहब जानकी कुटीर में जहां रहते थे, वहां काफी बौद्धिक लोग भी रहा करते थे जैसे कैफी आजमी। वहां गुरु दत्त सहित तमाम इंटेलेक्चुअल लोगों का आना-जाना लगा रहता था। एक दिन पता लगा कि अबरार साहब ने शादी कर ली है। उन्होंने अपनी नौकरानी यशोदा से शादी की थी। अबरार साहब और यशोदा आंटी के व्यक्तित्व में जमीन-आसमान का अंतर था।
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अबरार साहब लंबे चौड़े थे जबकि यशोदा आंटी की लंबाई थी मात्र चार फुट। अब जब शादी हो गई तो उनके दोस्तों ने कहा कि दुनिया की फिक्र छोड़कर आपको शादी की पार्टी देनी चाहिए। उन्हें बधाई देने उस पार्टी में कैफी आजमी सहित फिल्म बिरादरी की बड़ी शख्सियतें आईं। यशोदा आंटी को लगा कि उनके जानने वाले तो उस पार्टी का हिस्सा बने ही नहीं। वो बोलीं कि अबरार मुझे भी अपने दोस्तों को पार्टी देनी है।
यशोदा आंटी की पार्टी में बिल्डिंग के चौकीदार, रसोइये और नौकर आए। शराब के नशे में सब चूर होकर वहीं लेट गए। बौद्धिक लोगों के बीच वह अबरार साहब थे, पर यशोदा आंटी के मित्रों के लिए उनका बौद्धिक व्यक्तित्व कोई मायने नहीं रखता था। अब अबरार साहब ने शादी की थी तो निभाना भी था।
दिग्गज फिल्मकारों की फिल्म में मिला दूसरों को क्रेडिट
साहब बीवी और गुलाम (Saheb Biwi Aur Ghulam) फिल्म की बात करें तो अबरार साहब की फिल्मोग्राफी में ये एकलौती फिल्म थी, जिसके साथ बतौर निर्देशक उनका नाम जुड़ा था। हालांकि फिल्म के हर फ्रेम में गुरु दत्त की छाप दिखती है। उस दौर में साहब बीवी और गुलाम सहित चार ऐसी फिल्में आई थीं, जिन्हें दिग्गज फिल्मकारों ने बनाया था, पर क्रेडिट किसी और को दिया।
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राज कपूर (Raj Kapoor) साहब की फिल्म थी जिस देश में गंगा बहती है। ये फिल्म राज साहब ने ही बनाई थी, पर बतौर निर्देशक नाम दिया राधू करमाकर का, जो उनकी अधिकांश फिल्मों के सिनेमैटोग्राफर थे। सुनील दत्त साहब ने फिल्म बनाई थी मुझे जीने दो, उसमें उन्होंने निर्देशन में नाम दिया था मोनी भट्टाचार्जी का। युसुफ साहब (दिलीप कुमार) ने फिल्म गंगा जमुना बनाई, पर बतौर निर्देशक नाम दिया नितिन बोस का, वो भी सिनेमैटोग्राफर थे।
इस बात को सभी लोग जानते थे। दरअसल ये इन फिल्मकारों के हृदय की विशालता थी कि उन्होंने अपने साथ काम करने वालों को
सम्मान स्वरूप ये श्रेय दिया।
अबरार अल्वी के बारे में
अबरार अल्वी भारतीय फिल्म डायरेक्टर, लेखर और एक्टर थे। उन्होंने अपने ज्यादातर अहम काम 1950 और 1960 के दशक में गुरु दत्त के साथ किए। उन्होंने भारतीय सिनेमा की कुछ सबसे बेहतरीन फिल्में लिखीं, जिनमें 'साहिब बीवी और गुलाम' (1962), 'कागज के फूल' (1959) और 'प्यासा' (1957) शामिल हैं; इन फिल्मों को दुनिया भर में आज भी बहुत पसंद किया जाता है।
भारत के दिग्गज फिल्ममेकर और राइटर अबरार अल्वी (Abrar Alvi) ने इंडियन सिनेमा को कई बेहतरीन फिल्में दीं। उनके जन्म शताब्दी वर्ष पर पढ़ें उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें...

अबरार अल्वी के जन्म शताब्दी वर्ष पर जानें दिलचस्प बातें
HIGHLIGHTS
अबरार अल्वी के जन्म शताब्दी वर्ष पर जानें दिलचस्प बातें
गुरुदत्त ने अबरार साहब को दी थी निर्देशन की कमान
अबरार अल्वी ने भारतीय सिनेमा को दी बेहतरीन फिल्में
राहुल रवेल, मुंबई। प्यासा, कागज के फूल सहित कई क्लासिक फिल्में देने वाले लेखक अबरार अल्वी किरदारों के नामों से लेकर संवादों को कहानी में पिरोने में माहिर थे। माना जाता है कि साहब बीवी और गुलाम गुरु दत्त की फिल्म थी। फिर क्या वजह थी कि गुरु दत्त ने अबरार साहब को सौंप दी उसके निर्देशन की कमान? अबरार अल्वी के जन्म शताब्दी वर्ष में उनकी कला और व्यक्तित्व के विभिन्न पहलु...
अबरार साहब (Abrar Alvi) का लेखन शानदार था। उन्होंने पापा (फिल्मकार एच.एस. रवेल) के साथ संघर्ष (1968) और लैला मजनू (1976) समेत कई फिल्मों में काम किया था। अबरार साहब ने मुझे बचपन से देखा था। मेरे लिए वो अबरार अंकल थे, लेकिन जब मैंने उनके साथ प्रोफेशनल तौर पर काम करना शुरू किया तो वो मेरे लिए अबरार साहब हो गए।
जब कॉमेडी फिल्म के लिए अबरार साहब से हुई मुलाकात
मैंने उनके साथ बतौर फिल्मकार फिल्म बीवी ओ बीवी में काम किया था। ये कॉमेडी फिल्म थी, मुझे लगा कि इस जॉनर में लेखन के लिए उनसे बेहतर कोई नहीं हो सकता। मैंने उन्हें फिल्म की कहानी सुनाई। अबरार साहब ने कहा कि उन्हें सोचने के लिए एक हफ्ते का समय चाहिए। इतना समय बीतने पर मैंने उन्हें कॉल किया तो उन्होंने कहा कि किरदारों के नाम सोचने के लिए अभी चार-पांच दिन और लगेंगे।
बहरहाल पांच दिन बाद उन्होंने मुझे मुलाकात के लिए मुंबई में जानकी कुटीर स्थित अपने घर बुलाया। उन्होंने नायक चंद्रमोहन सहित अन्य किरदारों के नाम बताए। तब मैंने उनसे कहा कि आपने केवल नाम सोचने के लिए दस दिन ले लिए। इस पर वह बोले कि फिल्म विवाह के लिए किरदारों के कुंडली मिलान पर आधारित है।
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नाम का राशि से भी संबंध होता है। उसी के अनुरूप अन्य पात्रों के नाम मैंने सोचे हैं। मांगलिक नायक चंद्रमोहन की कुंडली
नायिका से किस तरह मिलेगी व किरदारों के बीच बातचीत से कैसी मजाकिया परिस्थितियां बनेंगी, ये सब भी मैंने सोच रखा है।
तब लगा कि अबरार साहब लेखन के स्तर पर कितना दूरगामी सोच रखते थे। फिल्म का काम आगे बढ़ा। सुबह 10-11 बजे जब मैं और रणधीर कपूर उनके घर पहुंचते थे तो वो सोए रहते थे। हमारे जगाने पर वह उठते थे। सबसे पहले वह अपना पुराना पेमेंट चेक करते थे कि वो मिला है कि नहीं, इसके बाद बात आगे बढ़ती। हम लोग भी मुस्कुरा दिया करते।
गुरुदत्त ने अबरार साहब को दी थी निर्देशन की कमान
साहब बीवी और गुलाम (Saheb Biwi Aur Ghulam) फिल्म से बतौर निर्देशक अबरार साहब का नाम जुड़ा था। हालांकि फिल्म को देखकर लोग यही मानते थे कि वो गुरु दत्त साहब (Guru Dutt) की फिल्म थी। उन्होंने फिल्म में बतौर निर्देशक अबरार साहब का नाम देकर उन्हें सम्मान दिया था। इस फिल्म के लिए अबरार साहब को बेस्ट डायरेक्टर का फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला था, जो उनके घर पर शोकेस में सजा था।
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अबरार साहब ने सामने रख दी थी बेस्ट डायरेक्शन की ट्रॉफी
एक दिन मेरी और अबरार साहब के बीच बहस हो गई। सामान्य तौर पर निर्देशक और लेखक के बीच ऐसी बहस होती ही है। अबरार साहब मुझसे बोले कि मेरी बात तुम्हें माननी चाहिए, मैंने तुम्हें बचपन से देखा, मैंने भी जवाब दिया इससे क्या फर्क पड़ता है। मैंने कहा कि अबरार साहब आपने डायलॉग सही नहीं लिखे, मैं शूट कैसे करूंगा।
इस पर अबरार साहब बोले कि कुछ देर रुको। वह सीढ़ी पर चढ़े और शेल्फ से फिल्म फेयर की वह ट्रॉफी उठाकर लाए और हमारे सामने रख दी। फिर बोले कि तुम निर्देशन का जो काम कर रहे हो, उसकी तारीफ का ये तमगा मेरे पास भी है। डब्बू साहब मुस्कुराए और बोले अबरार साहब बहुत दिन आपने ये ट्रॉफी अपने पास रख ली अब तो गुरु दत्त के ऑफिस
भेज दीजिए।
नौकरानी से अबरार साहब ने की थी शादी
अबरार साहब जानकी कुटीर में जहां रहते थे, वहां काफी बौद्धिक लोग भी रहा करते थे जैसे कैफी आजमी। वहां गुरु दत्त सहित तमाम इंटेलेक्चुअल लोगों का आना-जाना लगा रहता था। एक दिन पता लगा कि अबरार साहब ने शादी कर ली है। उन्होंने अपनी नौकरानी यशोदा से शादी की थी। अबरार साहब और यशोदा आंटी के व्यक्तित्व में जमीन-आसमान का अंतर था।
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अबरार साहब लंबे चौड़े थे जबकि यशोदा आंटी की लंबाई थी मात्र चार फुट। अब जब शादी हो गई तो उनके दोस्तों ने कहा कि दुनिया की फिक्र छोड़कर आपको शादी की पार्टी देनी चाहिए। उन्हें बधाई देने उस पार्टी में कैफी आजमी सहित फिल्म बिरादरी की बड़ी शख्सियतें आईं। यशोदा आंटी को लगा कि उनके जानने वाले तो उस पार्टी का हिस्सा बने ही नहीं। वो बोलीं कि अबरार मुझे भी अपने दोस्तों को पार्टी देनी है।
यशोदा आंटी की पार्टी में बिल्डिंग के चौकीदार, रसोइये और नौकर आए। शराब के नशे में सब चूर होकर वहीं लेट गए। बौद्धिक लोगों के बीच वह अबरार साहब थे, पर यशोदा आंटी के मित्रों के लिए उनका बौद्धिक व्यक्तित्व कोई मायने नहीं रखता था। अब अबरार साहब ने शादी की थी तो निभाना भी था।
दिग्गज फिल्मकारों की फिल्म में मिला दूसरों को क्रेडिट
साहब बीवी और गुलाम (Saheb Biwi Aur Ghulam) फिल्म की बात करें तो अबरार साहब की फिल्मोग्राफी में ये एकलौती फिल्म थी, जिसके साथ बतौर निर्देशक उनका नाम जुड़ा था। हालांकि फिल्म के हर फ्रेम में गुरु दत्त की छाप दिखती है। उस दौर में साहब बीवी और गुलाम सहित चार ऐसी फिल्में आई थीं, जिन्हें दिग्गज फिल्मकारों ने बनाया था, पर क्रेडिट किसी और को दिया।
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राज कपूर (Raj Kapoor) साहब की फिल्म थी जिस देश में गंगा बहती है। ये फिल्म राज साहब ने ही बनाई थी, पर बतौर निर्देशक नाम दिया राधू करमाकर का, जो उनकी अधिकांश फिल्मों के सिनेमैटोग्राफर थे। सुनील दत्त साहब ने फिल्म बनाई थी मुझे जीने दो, उसमें उन्होंने निर्देशन में नाम दिया था मोनी भट्टाचार्जी का। युसुफ साहब (दिलीप कुमार) ने फिल्म गंगा जमुना बनाई, पर बतौर निर्देशक नाम दिया नितिन बोस का, वो भी सिनेमैटोग्राफर थे।
इस बात को सभी लोग जानते थे। दरअसल ये इन फिल्मकारों के हृदय की विशालता थी कि उन्होंने अपने साथ काम करने वालों को
सम्मान स्वरूप ये श्रेय दिया।
अबरार अल्वी के बारे में
अबरार अल्वी भारतीय फिल्म डायरेक्टर, लेखर और एक्टर थे। उन्होंने अपने ज्यादातर अहम काम 1950 और 1960 के दशक में गुरु दत्त के साथ किए। उन्होंने भारतीय सिनेमा की कुछ सबसे बेहतरीन फिल्में लिखीं, जिनमें 'साहिब बीवी और गुलाम' (1962), 'कागज के फूल' (1959) और 'प्यासा' (1957) शामिल हैं; इन फिल्मों को दुनिया भर में आज भी बहुत पसंद किया जाता है।
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