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'जलियांवाला बाग नरसंहार...' एक ऐसी त्रासदी की कहानी जिसपर बॉलीवुड ने बनाई कई फिल्में

'जलियांवाला बाग नरसंहार...' एक ऐसी त्रासदी की कहानी जिसपर बॉलीवुड ने बनाई कई फिल्में

भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का निर्णायक मोड़ था 13 अप्रैल 1919। जलियांवाला बाग का वह नरसंहार, जिसने स्वाधीनता आंदोलन की आग को और तेज कर दिया। इतिहास से ले ...और पढ़ें




स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। बैसाखी का उत्सव, खुशियों और आस्था का प्रतीक है, लेकिन 13 अप्रैल 1919 को यही दिन भारतीय इतिहास की सबसे भयावह स्मृतियों में बदल गया। जलियांवाला बाग में इकट्ठा हुए हजारों निहत्थे लोगों की उम्मीदें उस वक्त चीखों में तब्दील हो गईं, जब बिना किसी चेतावनी के गोलियों की बौछार ने मासूम जिंदगियों को चीर दिया।


उस दोपहर ने सिर्फ शरीरों को नहीं, बल्कि पूरे देश की आत्मा को घायल कर दिया। चारों ओर फैला सन्नाटा, खून से सनी जमीन और असहायता की वह तस्वीर मानो इंसानियत खुद कटघरे में खड़ी हो। यह केवल एक त्रासदी नहीं थी, बल्कि क्रूर सत्ता की वह कहानी थी, जिसने भारत की चेतना को झकझोर कर रख दिया और स्वतंत्रता की आग को और प्रज्जवलित कर दिया।

ब्रिटिश सरकार ने कभी नहीं मांगी माफी

पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’डायर के संरक्षण में ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर ने उस भीड़ पर तब तक गोलियां चलवाईं जब तक कि गोलियां खत्म नहीं हो गईं। लोग जान बचाने के लिए भागे, दीवारों से टकराए, कुएं में कूदे, लेकिन मौत हर दिशा में उनका इंतजार कर रही थी। हजारों मासूमों की मौत के बावजूद ब्रिटिश साम्राज्य ने कभी औपचारिक माफी नहीं मांगी।




शायद यही कारण है कि यह घटना केवल इतिहास नहीं, बल्कि एक जीवित स्मृति बन चुकी है। सिनेमा ने समय-समय पर इस त्रासदी को अपनी संवेदनशील दृष्टि से प्रस्तुत किया है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस दर्द को महसूस कर सकें और आजादी की कीमत समझ सकें। 1977 में आई फिल्म जलियांवाला बाग इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास थी। विनोद खन्ना, परीक्षित साहनी, शबाना आजमी और दीप्ति नवल जैसे कलाकारों ने इस फिल्म में भारतीयों के संघर्ष को जीवंत किया।

भगत सिंह के अंदर जगाई क्रांति की ज्वाला

इसके बाद 1982 में रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी में इस नरसंहार को एक बेहद मार्मिक दृश्य के रूप में दिखाया गया। ब्रिटिश सैनिकों का बाग में प्रवेश करना, बंदूकों का तैयार होना, और फिर निर्दयता से गोलियां चलाना यह सब इतना वास्‍तविक प्रतीत होता है कि दर्शक खुद को उस भयावह क्षण में खड़ा महसूस करता है। राजकुमार संतोषी की फिल्म द लीजेंड आफ भगत सिंह में यह घटना भले ही छोटे हिस्से के रूप में दिखाई गई हो, लेकिन उसका प्रभाव अत्यंत गहरा है। यही वह क्षण था जिसने भगत सिंह के मन में क्रांति की ज्वाला जलाई।



साल 2006 में आई राकेश ओम प्रकाश मेहरा

निर्देशित रंग दे बसंती ने इस घटना को प्रत्यक्ष रूप से नहीं, बल्कि उसकी स्मृति और प्रभाव के जरिए प्रस्तुत किया। फिल्म यह दर्शाती है कि इतिहास केवल किताबों में नहीं रहता, बल्कि वह वर्तमान में भी सांस लेता है और युवाओं को प्रेरित करता है। वहीं 2017 की फिल्म फिल्लौरी ने एक अलग शैली में इस घटना को अपनी कहानी में पिरोया,जिससे यह स्पष्ट होता है कि जलियांवाला बाग केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन चुका है।


साल 2021 में शूजित सरकार की फिल्म सरदार उधम केवल घटना को नहीं दिखाती, बल्कि उसके बाद के दर्द, आघात और प्रतिशोध की कहानी कहती है। निर्देशक ने खुद स्वीकार किया था कि इस सीक्वेंस को शूट करना बेहद कठिन था। 21 दिनों तक चले इस शूट के दौरान सेट पर एक अजीब-सी खामोशी छाई रहती थी। एक विशेष दृश्य में एक छोटी लड़की बेबे, बेबे, पुकारती है।

नम कर दी थी हर किसी की आंखे

शूजित सरकार उस समय शूट करने के मूड में नहीं थे, लेकिन कास्टिंग टीम के कहने पर उन्होंने यह सीन शूट किया। उन्होंने उधम बने विक्की कौशल को ज्यादा निर्देश नहीं दिए, बस इतना कहा कि लड़की बेबे पुकारेगी, फिर वह जैसा महसूस करें वैसा करें। जैसे ही लड़की ने बेबे पुकारा, विक्की अचानक फूट-फूटकर रोने लगे। यह दृश्य इतना वास्तविक था कि सेट पर मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। लड़की खुद भी स्तब्ध रह गई, क्योंकि उसे ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी। यह सिर्फ अभिनय नहीं था, बल्कि उस दर्द का अहसास था जो आज भी कचोटता है।


राम माधवानी निर्देशित वेब सीरीज द वेकिंग आफ ए नेशन ने इस घटना को एक अलग दृष्टिकोण से देखा। उन्होंने नरसंहार को प्रत्यक्ष रूप से दिखाने से परहेज किया। उनकी कहानी उस आयोग पर केंद्रित है जिसने इस त्रासदी की जांच की थी, और यह दर्शाती है कि कैसे सच को सामने लाने की कोशिश की गई। पिछले साल आई फिल्म केसरी चैप्टर 2: द अनटोल्ड स्टोरी आफ जलियांवाला बाग इस नरसंहार के जिम्‍मेदार रहे जनरल डायर को अदालत में खींचने वाले भारतीय वकील सी शंकरन नायर पर आधारित थी।

दुनिया को लेना चाहिए इससे सीख

निर्देशक करण सिंह त्यागी ने एक बच्चे परगट के नजरिए से इस त्रासदी को दिखाया जिसकी आंखों के सामने उसकी मां और बहन बिछड़ जाती है और फिर बहन की लाश मिलती है। करण कहते हैं कि एक्शन टीम, जो आमतौर पर कठोर मानी जाती है, वह भी इस दृश्य को देखकर रो पड़ी थी। करण का मानना है कि यह केवल इतिहास नहीं, बल्कि एक ऐसा ट्रामा है जिससे दुनिया को सीख लेनी चाहिए। वह कहते हैं कि आज तक ब्रिटिश सरकार ने इस घटना के लिए माफी नहीं मांगी। हमारी फिल्‍म से पहले एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें जनरल डायर की पोती ने जलियांवाला बाग में आए लोगों को लूटेरा कहा था। हमारा मकसद था यह बताना वह शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी थे।


बहरहाल, जलियांवाला बाग केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है अन्याय के खिलाफ खड़े होने की, इतिहास को याद रखने की और यह समझने की कि आजादी कितनी बड़ी कीमत पर हासिल हुई है। जब तक यह याद जिंदा है, तब तक उन शहीदों का बलिदान भी जिंदा रहेगा।
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