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डायरेक्शन में सौरभ शुक्ला ने आजमाया हाथ, OTT पर ट्रेंड कर रही है नई फिल्म

डायरेक्शन में सौरभ शुक्ला ने आजमाया हाथ, OTT पर ट्रेंड कर रही है नई फिल्म



दिग्गज अभिनेता के तौर पर सौरभ शुक्ला लंबे समय से सिनेमा में एक्टिव हैं। अब उन्होंने बतौर निर्देशक एक नई फिल्म को बनाया है, जो फिलहाल ओटीटी पर धमाल मचा ...और पढ़ें






एंटरटेनमेंट डेस्क, मुंबई। पिछले करीब तीन दशकों से अभिनय में सक्रिय सत्या और जाली एलएलबी फिल्मों के अभिनेता सौरभ शुक्ला लेखन और निर्देशन में भी गहरी रुचि रखते हैं। चेहरा और पप्पू कान्ट डांस साला जैसी फिल्में निर्देशित कर चुके सौरभ ने अब फिल्म जब खुली किताब (Jab Khuli Kitaab) का निर्देशन किया है।


हाल ही में जी 5 (Zee5) पर प्रदर्शित यह फिल्म एक ऐसे बुजुर्ग जोड़े की कहानी है, जिनके बीच उम्र के अंतिम पड़ाव पर तलाक की स्थिति आ जाती है। ओटीटी पर ये मूवी नंबर-1 पर ट्रेंड कर रही है। सौरभ से उनकी फिल्म, सफर और सिनेमा जगत में प्राथमिकताओं पर बातचीत:
कहते हैं कि सफलता के लिए किसी एक चीज पर ध्यान देना चाहिए। वहीं आप अभिनय के साथ लेखन और निर्देशन भी करते रहें?

देखिए ऐसा है कि जो कहते हैं कि एक ही चीज पर ध्यान दो, वो इंसानों के बारे में नहीं घोड़ों के बारे में कहा गया है। एक इंसान की जिंदगी में बहुत भूमिकाएं और जिम्मेदारियां होती हैं। ऐसे में अगर आपको कुछ करना पसंद है, तो आप हर वो चीज कर सकते हैं।

इस फिल्म की शुरुआत कैसे हुई?

इस फिल्म में जिग्नेश की भूमिका निभाने वाले अभिनेता सुनील पलवाल मेरे छात्र भी रह चुके हैं। वो मेरे पीछे पड़े थे कि सर एक कहानी सुनानी है। मैंने एक दिन बड़े बेमन ढंग से कहा सुनाओ। पहले तो उनकी कहानी मुझे ज्यादा समझ में नहीं आई, लेकिन नायक और नायिका के पात्र मुझे बहुत अच्छे लगे।




फिर मैंने सोचा कि अगर इन दोनों को ऐसी परिस्थितियों में डाल दिया जाए तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी? दिलचस्प बात यह है कि कहानी के शुरू में नायक काफी धीर-गंभीर होता है, लेकिन समस्या आने के बाद वह एक बच्चे जैसा हो जाता है।

इस फिल्म की कहानी वास्तविक घटना से प्रेरित है या काल्पनिक है?

ये पूरी कल्पना तो नहीं है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ऐसा मैंने कहीं देखा और फिर लिखा या किसी किसी एक जोड़े से प्रेरित होकर कहानी लिखी। फिल्म बनाने के बाद अभी कुछ दिनों पहले ही फिल्म के निर्माता और एप्लाज एंटरटेनमेंट के सीईओ समीर नायर ने मुझे एक क्लिप भेजी थी।




उसमें खबर यह थी कि एक 90 साल का आदमी 88 साल की पत्नी से तलाक मांग रहा था। कोर्ट इस बात को लेकर परेशान है कि 90 की उम्र हो चुकी है, यह केस जब तक खत्म होगा, तब तक पता नहीं आप रहो या नहीं।

जिंदगी की किताब से किस अध्याय के बारे में किसी को नहीं बताना चाहेंगे?

जब जिंदगी की किताब खुलती है तो हिसाब भारी पड़ ही जाता है। मैं तो फिल्में बनाता हूं, उसमें काम करता हूं। मैं तो चाहता हूं कि मेरी जिंदगी की किताब का ऐसा कोई पन्ना ना हो जो ना खुले। बल्कि मैं जिंदगी के बारे में लोगों को किताब के तौर पर पढ़ाने की बजाय, उन पर फिल्में बनाना चाहूंगा।


अगर आपकी जीवन पर कोई किताब लिखी जाए, तो उसको क्या शीर्षक देना चाहेंगे? – मुख्य पृष्ठ पर लिखा होगा ‘सर, इसे क्या नाम दें?’ यही किताब का शीर्षक होगा।
रिश्तों के बीच निर्णय लेने के मामले में आज समाज में महिलाओं को कैसे देखते हैं?

सैकड़ों वर्षों से हमारे समाज की संरचना कुछ ऐसी रही है कि महिलाओं और पुरुषों के बीच अंतर रखा गया। हालांकि, मौजूदा दौर को लेकर मेरा यही कहना है कि मैं कौन होता हूं महिलाओं को शक्ति या अधिकार देने वाला? महिलाएं खुद हसशक्त हैं, ये तो हमारे पुराणों में भी लिखा है और ऐसा दिख भी रहा है।

कभी अंदर का निर्देशक नहीं कहता कि अब मुझे ज्यादा समय देना चाहिए?

एक सवाल यह भी मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि जब आप एक्टिंग कर रहे होते हैं, तो आपके अंदर का निर्देशक आपके ऊपर हावी नहीं होता है। ऐसे ही निर्देशन को लेकर भी पूछा जाता है कि अभिनेता हावी नहीं होता? हालांकि, मेरे साथ ऐसा नहीं होता है। जब मैं निर्देशित कर रहा होता हूं, तो मुझे इस बात में ज्यादा दिलचस्पी होती है कि जो मैंने अपनी फिल्म के बारे में सोचा है, उसमें कलाकार अपने अनुभवों के आधार पर अपनी तरफ से क्या नए पहलुओं को जोड़ सकता है।


ऐसा नहीं है कि मेरे अंदर ही एक्टर और निर्देशक के बीच टकराव चलता रहता है। अगर मैं बतौर निर्देशक कलाकारों को एक्टिंग करके दिखाऊं कि ऐसे करना है और वह बिल्कुल वैसे ही करें, तो लगेगा कि बहुत सारे सौरभ शुक्ला ही स्क्रीन पर दिख रहे हैं। बहुत बोरियत भरा होगा। हां, जब आप एक्टिंग कर रहे होते हैं, तो आपके अंदर का लेखक उसमें समझ जोड़ता है।
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