कोल्हान के 'दद्दू' अब नहीं रहे: 600 पदकों के धनी टिपरिया तियु का निधन
कोल्हान के 'दद्दू' अब नहीं रहे: 600 पदकों के धनी टिपरिया तियु का निधन
Jharkhand वरिष्ठ एथलीट और प्रशिक्षक टिपरिया तियु, जिन्हें 'कोल्हान के दद्दू' के नाम से जाना जाता था, का 73 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। उन्होंने अप ...और पढ़ें

73 में भी 10 किमी दौड़ते थे, अब हमेशा के लिए रुक गए।
1300 से अधिक एथलीटों को प्रशिक्षित किया।
उन्होंने 106 स्वर्ण सहित कुल 600 पदक जीते।
चाईबासा। झारखंड के खेल जगत के लिए यह अत्यंत दुःखद क्षण है। वरिष्ठ एथलीट, कुशल प्रशिक्षक और खेल आंदोलन के सशक्त स्तंभ रहे ‘कोल्हान के दद्दू’ टिपरिया तियु का निधन हो गया है।
उनके जाने से न केवल पश्चिमी सिंहभूम जिला, बल्कि पूरा राज्य एक ऐसे व्यक्तित्व से वंचित हो गया है, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन खेल, अनुशासन और युवा निर्माण को समर्पित कर दिया।
टिपरिया तियु ने 19 वर्ष की उम्र में टाटा स्टील में नौकरी पाने के उद्देश्य से दौड़ना शुरू किया था। तब उन्होंने नहीं सोचा था कि एथलेटिक्स ही उनका जीवन-मार्ग और पहचान बन जाएगा।
समय के साथ दौड़ उनका शौक, साधना और फिर प्रोफेशन बन गई। कड़ी मेहनत, अनुशासन और अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने खेल के क्षेत्र में वह मुकाम हासिल किया, जो विरले ही किसी को नसीब होता है।
अपने लंबे और गौरवशाली खेल जीवन में उन्होंने इंटर डिस्ट्रिक्ट, नेशनल, एशियाड एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेते हुए 106 स्वर्ण पदकों सहित कुल लगभग 600 पदक अपने नाम किए।
यह उपलब्धि उन्हें झारखंड ही नहीं, बल्कि देश के सफल मास्टर्स एथलीटों की अग्रिम पंक्ति में स्थापित करती है। 73 वर्ष की उम्र में भी उनकी खेल प्रतिबद्धता प्रेरणादायक रही।
73 की उम्र में 10 किमी दौड़ते थे
वे आगामी 35वीं नेशनल मास्टर्स एथलेटिक्स चैंपियनशिप (24–25 फरवरी) की तैयारी में जुटे थे और प्रतिदिन लगभग 10 किलोमीटर दौड़ लगाते थे। उनका जीवन इस बात का जीवंत उदाहरण रहा कि उम्र कभी भी संकल्प और मेहनत के मार्ग में बाधा नहीं बन सकती।
पश्चिमी सिंहभूम जिले के खूंटपानी प्रखंड के महज 80 घरों वाले छोटे से गांव गिंडीमुंडी से निकलकर उन्होंने जो पहचान बनाई, वह हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है।
दौड़ के साथ-साथ उन्हें आर्चरी और फुटबॉल में भी गहरी रुचि थी। विशेष रूप से खेल प्रशिक्षण के क्षेत्र में उनका योगदान अविस्मरणीय रहा। उन्होंने अब तक लगभग 1300 एथलीटों को प्रशिक्षण देकर उन्हें राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए तैयार किया।
तियु केवल एक उत्कृष्ट खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि दूरदर्शी खेल शिक्षक भी थे। जिले में महिला फुटबॉल की शुरुआत कर उन्होंने खेल में लैंगिक समानता की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की।
झारखंड के सैकड़ों खिलाड़ियों को तैयार किया
रांची में आयोजित नेशनल इंटर डिस्ट्रिक्ट एथलेटिक्स चैंपियनशिप और झारखंड राज्य एथलेटिक्स चैंपियनशिप के लिए वे लगातार अपने शिष्यों का मार्गदर्शन करते रहे।
उनका निधन झारखंड के खेल इतिहास के एक स्वर्णिम अध्याय के समाप्त होने जैसा है। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए संघर्ष, समर्पण और अनुशासन की जीवंत मिसाल बनकर सदैव स्मरण किए जाएंगे।
Jharkhand वरिष्ठ एथलीट और प्रशिक्षक टिपरिया तियु, जिन्हें 'कोल्हान के दद्दू' के नाम से जाना जाता था, का 73 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। उन्होंने अप ...और पढ़ें

73 में भी 10 किमी दौड़ते थे, अब हमेशा के लिए रुक गए।
1300 से अधिक एथलीटों को प्रशिक्षित किया।
उन्होंने 106 स्वर्ण सहित कुल 600 पदक जीते।
चाईबासा। झारखंड के खेल जगत के लिए यह अत्यंत दुःखद क्षण है। वरिष्ठ एथलीट, कुशल प्रशिक्षक और खेल आंदोलन के सशक्त स्तंभ रहे ‘कोल्हान के दद्दू’ टिपरिया तियु का निधन हो गया है।
उनके जाने से न केवल पश्चिमी सिंहभूम जिला, बल्कि पूरा राज्य एक ऐसे व्यक्तित्व से वंचित हो गया है, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन खेल, अनुशासन और युवा निर्माण को समर्पित कर दिया।
टिपरिया तियु ने 19 वर्ष की उम्र में टाटा स्टील में नौकरी पाने के उद्देश्य से दौड़ना शुरू किया था। तब उन्होंने नहीं सोचा था कि एथलेटिक्स ही उनका जीवन-मार्ग और पहचान बन जाएगा।
समय के साथ दौड़ उनका शौक, साधना और फिर प्रोफेशन बन गई। कड़ी मेहनत, अनुशासन और अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने खेल के क्षेत्र में वह मुकाम हासिल किया, जो विरले ही किसी को नसीब होता है।
अपने लंबे और गौरवशाली खेल जीवन में उन्होंने इंटर डिस्ट्रिक्ट, नेशनल, एशियाड एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेते हुए 106 स्वर्ण पदकों सहित कुल लगभग 600 पदक अपने नाम किए।
यह उपलब्धि उन्हें झारखंड ही नहीं, बल्कि देश के सफल मास्टर्स एथलीटों की अग्रिम पंक्ति में स्थापित करती है। 73 वर्ष की उम्र में भी उनकी खेल प्रतिबद्धता प्रेरणादायक रही।
73 की उम्र में 10 किमी दौड़ते थे
वे आगामी 35वीं नेशनल मास्टर्स एथलेटिक्स चैंपियनशिप (24–25 फरवरी) की तैयारी में जुटे थे और प्रतिदिन लगभग 10 किलोमीटर दौड़ लगाते थे। उनका जीवन इस बात का जीवंत उदाहरण रहा कि उम्र कभी भी संकल्प और मेहनत के मार्ग में बाधा नहीं बन सकती।
पश्चिमी सिंहभूम जिले के खूंटपानी प्रखंड के महज 80 घरों वाले छोटे से गांव गिंडीमुंडी से निकलकर उन्होंने जो पहचान बनाई, वह हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है।
दौड़ के साथ-साथ उन्हें आर्चरी और फुटबॉल में भी गहरी रुचि थी। विशेष रूप से खेल प्रशिक्षण के क्षेत्र में उनका योगदान अविस्मरणीय रहा। उन्होंने अब तक लगभग 1300 एथलीटों को प्रशिक्षण देकर उन्हें राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए तैयार किया।
तियु केवल एक उत्कृष्ट खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि दूरदर्शी खेल शिक्षक भी थे। जिले में महिला फुटबॉल की शुरुआत कर उन्होंने खेल में लैंगिक समानता की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की।
झारखंड के सैकड़ों खिलाड़ियों को तैयार किया
रांची में आयोजित नेशनल इंटर डिस्ट्रिक्ट एथलेटिक्स चैंपियनशिप और झारखंड राज्य एथलेटिक्स चैंपियनशिप के लिए वे लगातार अपने शिष्यों का मार्गदर्शन करते रहे।
उनका निधन झारखंड के खेल इतिहास के एक स्वर्णिम अध्याय के समाप्त होने जैसा है। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए संघर्ष, समर्पण और अनुशासन की जीवंत मिसाल बनकर सदैव स्मरण किए जाएंगे।
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