इजरायल रख सकता है परमाणु हथियार तो ईरान क्यों नहीं? अंतरराष्ट्रीय कानून का क्या है नियम
इजरायल रख सकता है परमाणु हथियार तो ईरान क्यों नहीं? अंतरराष्ट्रीय कानून का क्या है नियम
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच यह सवाल उठा है कि ईरान को परमाणु हथियार रखने की अनुमति क्यों नहीं, जबकि इजरायल को है। ...और पढ़ें
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अंतरराष्ट्रीय कानून में परमाणु हथियार के लिए नियम (फोटो-रॉयटर्स)
ईरान एनपीटी का सदस्य, परमाणु हथियार विकसित नहीं कर सकता।
इजरायल एनपीटी का सदस्य नहीं, संधि के दायित्व लागू नहीं।
अंतरराष्ट्रीय कानून संप्रभु राष्ट्रों की सहमति पर आधारित है।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर नई आशंकाओं के बीच एक बार फिर यह सवाल तेज हुआ है कि इजरायल परमाणु हथियार रख सकता है, जबकि ईरान को ऐसा करने की अनुमति क्यों नहीं है।
पहली नजर में यह दोहरा मानदंड लग सकता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून की संरचना बताती है कि दोनों देशों की स्थिति उनके अलग-अलग कानूनी दायित्वों से तय होती है।
परमाणु हथियार रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून
अंतरराष्ट्रीय कानून मूलत: संप्रभु राष्ट्रों की सहमति पर आधारित व्यवस्था है। किसी भी देश की सैन्य क्षमता, विशेषकर परमाणु हथियार रखने या त्यागने का प्रश्न, उसी की संप्रभु सहमति से जुड़ा होता है।
यही सिद्धांत 1968 की परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जो विश्व परमाणु व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी आधार मानी जाती है।
इसी कानूनी ढांचे के कारण ईरान, जिसने 1970 में एनपीटी पर हस्ताक्षर किए, कानूनी रूप से परमाणु हथियार विकसित नहीं कर सकता।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आइएईए) की निगरानी में आता है और उसे अपने सभी परमाणु गतिविधियों की जानकारी अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के लिए उपलब्ध करानी होती है। यदि ईरान इस दायित्व का उल्लंघन करता है तो उस पर अंतरराष्ट्रीय कानूनी कार्रवाई संभव होती है।
इसके विपरीत इजरायल एनपीटी का सदस्य नहीं है। अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांत के अनुसार कोई भी संधि केवल उन्हीं देशों पर लागू होती है जिन्होंने उसे स्वीकार किया हो। चूंकि इजरायल ने एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए, इसलिए उस पर इस संधि के तहत परमाणु हथियार न रखने का दायित्व लागू नहीं होता।
यही कारण है कि इजरायल की परमाणु क्षमता पर अंतरराष्ट्रीय बहस तो होती है, लेकिन एनपीटी के आधार पर उस पर कानूनी उल्लंघन का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
विशेषज्ञों के अनुसार यही स्थिति भारत, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया की भी है। भारत और पाकिस्तान ने कभी एनपीटी नहीं अपनाई, जबकि उत्तर कोरिया 2003 में संधि से बाहर हो गया। इसलिए इन देशों की परमाणु स्थिति एनपीटी के बाहर अलग कानूनी ढांचे में देखी जाती है।
एनपीटी की संरचना पैदा करती है विरोधाभास
एनपीटी यानी परमाणु अप्रसार संधि का उद्देश्य परमाणु हथियारों का प्रसार रोकना, निरस्त्रीकरण को बढ़ावा देना और परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को सुरक्षित बनाना है।
इस संधि के तहत दुनिया को दो वर्गों में बांटा गया है- वे पांच देश जिन्हें परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र माना गया है, अर्थात अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन, तथा बाकी सभी सदस्य देश जिन्हें गैर-परमाणु राष्ट्र माना जाता है।
संधि के अनुसार केवल वे देश परमाणु शक्ति संपन्न माने गए, जिन्हें एक जनवरी 1967 से पहले परमाणु विस्फोट करने का दर्जा प्राप्त था।
एनपीटी के तहत गैर-परमाणु सदस्य देशों ने यह वचन दिया है कि वे परमाणु हथियार विकसित नहीं करेंगे। इसके बदले परमाणु शक्ति संपन्न देशों पर यह दायित्व डाला गया कि वे ऐसी तकनीक या हथियार किसी अन्य देश को उपलब्ध नहीं कराएंगे और निरस्त्रीकरण पर ईमानदार वार्ता करेंगे।
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