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तीन प्रधानमंत्री, एक सुप्रीम लीडर... खामनेई के साथ भारत की कूटनीतिक यात्रा

तीन प्रधानमंत्री, एक सुप्रीम लीडर... खामनेई के साथ भारत की कूटनीतिक यात्रा


भारत और ईरान के संबंध वैचारिक मतभेदों के बावजूद व्यावहारिक हितों पर आधारित रहे हैं। अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी ने खामेनेई से मुला ...और पढ़ें





 ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के साथ भारत के संबंध मूलतः व्यवहारिक हितों पर आधारित रहे। वैचारिक मतभेदों और क्षेत्रीय तनावों के बावजूद पिछले 25 वर्षों में भारत के तीन प्रधानमंत्रियों अटल बिहारी वाजपेयी (2001), मनमोहन सिंह (2012) और नरेन्द्र मोदी (2016) ने अलग-अलग मौकों पर उनसे मुलाकात की।


हर बार जब यह शिखर स्तर की बैठक हुई, तब द्विपक्षीय हितों से जुड़े मुद्दों जैसे ऊर्जा, क्षेत्रीय स्थिरता और कनेक्टिविटी को लेकर सहयोग आगे बढ़ा और कुछ मामले में तो खामनेई के हस्तक्षेप ने ईरान की सरकार को भारत को लेकर दो टूक फैसला करने में मदद किया। चाबहार पोर्ट की विकास परियोजना इसका एक बड़ा उदाहरण रहा है।
हमेशा सहज नहीं रहे खामनेई के साथ रिश्ते

हालांकि यह रिश्ता हमेशा सहज नहीं रहा। खामनेई ने कई अवसरों पर कश्मीर मुद्दे पर टिप्पणी कर भारत को असहज किया। विशेषकर 2019 के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर (अब एक्स) पर उनके आधिकारिक अकाउंट से कश्मीर पर भारत-आलोचनात्मक पोस्ट सामने आए, जिनमें कश्मीरी मुसलमानों के समर्थन की बात कही गई। इन बयानों पर भारत ने कड़ा विरोध दर्ज कराया था।


जम्मू व कश्मीर से धारा 370 समाप्त करने के कुछ ही दिनों बाद खामनेई ने लिखा था कि, “हम कश्मीर में मुसलमानों की स्थिति को लेकर चिंतित हैं। हमारे और भारत के बीच अच्छे रिश्ते हैं, लेकिन उम्मीद है कि भारतीय सरकार कश्मीर के प्रतिष्ठित लोगों के प्रति एक न्यायपूर्ण नीति अपनाए और इस क्षेत्र में मुसलमानों के उत्पीड़न और डराने-धमकाने को रोके।”


इस पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने कड़ा विरोध जताते हुए कहा था कि, “ऐसे टिप्पणियां गलत सूचना पर आधारित और अस्वीकार्य हैं और किसी भी देश को भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने से पहले अपनी खुद की स्थिति और रिकॉर्ड को देखना चाहिए।”

ईरान के साथ संबंधों पर खुलकर फैसला नहीं ले पाया भारत

इसके विपरीत, इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) की बैठकों में ईरान ने कई बार पाकिस्तान की तीखी भाषा को संतुलित किया और भारत के साथ संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया। यानी सार्वजनिक बयानबाजी और कूटनीतिक व्यवहार में अंतर साफ दिखता रहा।


उसी वर्ष जब यूएई में होने वाली ओआईसी की बैठक में भारत को आमंत्रित किया गया तो इसका समर्थन ईरान ने किया। पाकिस्तान के विरोध के बावजूद पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इसमें हिस्सा लिया जिसे भारत की एक बड़ी कूटनीतिक जीत के तौर पर देखा जाता है।


असलियत यह है कि पिछले दो दशकों में भारत ईरान के साथ अपने संबंधों पर कभी खुल कर फैसला नहीं कर पाया है और इसकी वजह अमेरिका की दबाव बनाने वाली नीतियां हैं। ईरान को लेकर भारत की नीति आज भी अमेरिका के साथ संबंधो को देख कर तय हो रही है।

पीएम मोदी और खामनेई की मुलाकात

खामनेई से वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री मोदी की तेहरान यात्रा के दौरान हुई मुलाकात काफी निर्णायक साबित हुई थी। मोदी और खामनेई की मुलाकात में क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और आर्थिक सहयोग को नई दिशा मिली।


विशेष रूप से चाबहार पोर्ट परियोजना को रणनीतिक प्राथमिकता दी गई। भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच त्रिपक्षीय समझौते ने चाबहार को भारत की मध्य एशिया को जोड़ने की नीति के आधार के तौर पर देखा गया।

यह बंदरगाह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के समानांतर एक वैकल्पिक मार्ग के रूप में देखा गया, जिससे भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुंच मिली। ग्वादर पोर्ट का विकास चीन कर रहा है। मोदी-खामनेई वार्ता के बाद भारत ने चाबहार में निवेश बढ़ाया और वहां परिचालन की जिम्मेदारी भारतीय पक्ष को सौंपी गई। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों और क्षेत्रीय अस्थिरता ने परियोजना की रफ्तार को प्रभावित किया।


अब खामनेई के बाद की राजनीतिक स्थिति में चाबहार का भविष्य कुछ हद तक अनिश्चित दिखाई देता है। खास तौर पर तब जब चाबहार पोर्ट में भारतीय निवेश को बंद करने का दबाव लगातार अमेरिका की तरफ से बढ़ रहा है।

वाजपेयी और खामनेई की मुलाकात

इसके पहले वाजपेयी और खामनेई की 2001 की मुलाकात ने आतंकवाद-विरोधी सहयोग और अफगानिस्तान के प्रश्न पर साझा समझ विकसित की थी। उस समय तालिबान के उदय और क्षेत्रीय अस्थिरता पर दोनों पक्षों की चिंताएं मिलती-जुलती थीं। इसी दौर में ऊर्जा सहयोग को संस्थागत रूप देने और दीर्घकालिक साझेदारी पर सहमति बनी।

मनमोहन सिंह और खामनेई की मुलाकात

वर्ष 2012 में मनमोहन सिंह और खामनेई की मुलाकात ऐसे समय हुई जब ईरान पर पश्चिमी प्रतिबंध चरम पर थे। भारत ने तेल आयात और भुगतान तंत्र के मुद्दों पर संतुलित समाधान खोजने का प्रयास किया। चाबहार पर प्रारंभिक सहमति और बैंकिंग व्यवस्था को वैकल्पिक तंत्र से चलाने पर चर्चा हुई।


यह वह दौर था जब भारत ने स्पष्ट संकेत दिया कि वह अमेरिकी दबाव के बावजूद अपने ऊर्जा और रणनीतिक हितों को पूरी तरह त्यागने को तैयार नहीं है। समग्र रूप से देखा जाए तो खामनेई के साथ भारत का रिश्ता वैचारिक निकटता पर नहीं, बल्कि पारस्परिक हितों पर टिका रहा।


इन तीन प्रधानमंत्रियों की मुलाकातों ने यह सुनिश्चित किया कि संवाद की डोर बनी रहे। अब बदलते पश्चिम एशियाई परिदृश्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह व्यवहारिक साझेदारी किस दिशा में आगे बढ़ती है।
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