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क्या गैस-तेल के बाद अगली बलि इंटरनेट की? जानिए कैसे वॉर से ब्लैकआउट हो सकता है आपका डेटा

क्या गैस-तेल के बाद अगली बलि इंटरनेट की? जानिए कैसे वॉर से ब्लैकआउट हो सकता है आपका डेटा

अमेरिका-ईरान का युद्ध अब आगे बढ़ते हुए तीसरे हफ्ते तक आ पहुंचा है। पहले ही लोगों ने इससे कई तबाही के मंजर देखें हैं। साथ ही भारत में गैस और तेल की सप् ...और पढ़ें





अमेरिका-ईरान तीसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है। Photo- Gemini AI.


टेक्नोलॉजी डेस्क, नई दिल्ली। अमेरिका-ईरान युद्ध अपने तीसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है और इस बात का डर है कि इसका असर मिसाइल, तेल और मिलिट्री टारगेट्स से आगे बढ़ सकता है। समुद्र की सतह के नीचे ऐसी केबलें बिछी हैं जो न सिर्फ मिडिल ईस्ट में बल्कि पूरी दुनिया के यूजर्स को इंटरनेट मुहैया कराती हैं। इस युद्ध के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तक फैलने का पहला संकेत पिछले हफ्ते मिला, जब मेटा ने ब्लूमबर्ग को बताया कि उसने अपने 2Africa प्रोजेक्ट के एक हिस्से को रोक दिया है। ये एक प्लान्ड 45,000 किलोमीटर लंबी पानी के नीचे बिछाई जाने वाली केबल सिस्टम थी, जिसका मकसद पूरे अफ्रीका और खाड़ी क्षेत्र में इंटरनेट कनेक्टिविटी का विस्तार करना था।


इस रोक का असर केबल के उस हिस्से पर पड़ा है जो ओमान, UAE, कतर, बहरीन, कुवैत, इराक, पाकिस्तान, भारत और सऊदी अरब के लैंडिंग स्टेशनों से होकर गुजरता है। ये वे देश हैं (भारत को छोड़कर) जो इस समय सीधे तौर पर मौजूदा संघर्ष क्षेत्र के अंदर या उसके आस-पास स्थित हैं। फेसबुक की पेरेंट कंपनी ने इस हिस्से को इसी साल लॉन्च करने की योजना बनाई थी।
इसके अलावा, केबल बिछाने की जिम्मेदारी संभालने वाली फ्रांस की सरकारी कंपनी, Alcatel Submarine Networks ने अपने ग्राहकों को 'फोर्स मेज्योर' (अप्रत्याशित घटना) के नोटिस जारी किए हैं। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी ने ये भी बताया है कि उसका इंस्टॉलेशन शिप, 'Ile De Batz', सऊदी अरब के दम्माम तट के पास फंस गया है।






दुनिया का इंटरनेट इन्हीं समुद्री रास्तों से होकर गुजरता है

रेड सी और परशियन गल्फ के नीचे, समुद्र तल पर बिछे सैकड़ों फाइबर ऑप्टिक केबल दुनिया के 95% से भी ज्यादा इंटरनेट ट्रैफ़िक को ले जाते हैं।

इसका मतलब है कि आपके ईमेल, वीडियो कॉल और क्लाउड सेवाओं से लेकर वित्तीय लेन-देन और स्ट्रीमिंग तक सब कुछ इन्हीं केबलों पर निर्भर करता है।

'Capacity Global' के मुताबिक, अकेले रेड सी से ही कम से कम 17 सबमरीन केबलें गुजरती हैं, जो यूरोप, एशिया और अफ्रीका को जोड़ने वाला एक बेहद अहम डेटा कॉरिडोर बनाती हैं। 'TeleGeography' के मुताबिक, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ भी उतना ही महत्वपूर्ण है। क्योंकि, AAE-1, FALCON, Gulf Bridge International Cable System और Tata TGN Gulf जैसी प्रमुख केबल सिस्टम इसी क्षेत्र से होकर गुजरती हैं।


ये केबल्स Amazon, Microsoft और Google जैसी कंपनियों द्वारा खाड़ी क्षेत्र में बनाए गए बड़े-बड़े डेटा सेंटरों को दुनिया भर के अरबों यूजर्स से जोड़ती हैं। इन केबल्स को नुकसान पहुंचाना काफी आसान होता है। चाहे वह नौसेना की बारूदी सुरंगों (mines) से हो, जहाजों के लंगरों (anchors) से हो, या फिर सीधे सैन्य कार्रवाई से। ईरान पहले ही इस स्ट्रेट में समुद्री बारूदी सुरंगें बिछा चुका है, जिससे जहाजों की आवाजाही के लिए ये रास्ता लगभग पूरी तरह से बंद हो गया है।


पिछले साल, रेड सी में एक केबल कटने की वजह से भारत, पाकिस्तान और मिडिल-ईस्ट के देशों में इंटरनेट सेवाओं पर असर पड़ा था। बताया गया कि एक कमर्शियल जहाज का लंगर घिसटता हुआ गया और उसने समुद्र के नीचे बिछी कई इंटरनेट केबलों को काट दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, रेड सी इस मामले में ज्यादा संवेदनशील है, क्योंकि यहां केबल्, अपेक्षाकृत कम गहरे पानी में बिछी होती हैं, जिससे घिसटते हुए लंगर के लिए उन्हें नुकसान पहुंचाना आसान हो जाता है।
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